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राज्योत्सव का समापन दिवस – मंच पर रौनक, मैदान में सन्नाटा

बालोद:- छत्तीसगढ़ के बालोद जिला में राज्योत्सव का समापन दिन उत्साह और उदासी का मिला-जुला प्रतिबिंब साबित हुआ। मंच पर रंग-बिरंगी रोशनी, लोकगीतों की मधुर धुन और नन्हें कलाकारों की मनमोहक प्रस्तुतियों ने वातावरण को जीवंत बना दिया। तालियों की गूंज से पूरा पंडाल गूंज उठा, परंतु मंच की इस चमक के पीछे मैदान की सच्चाई कुछ और ही कहानी कह रही थी। विभागीय स्टॉल लगभग खाली पड़े थे, अधिकारी नदारद थे और कर्मचारी महज उपस्थिति दर्ज कराने की औपचारिकता निभाते दिखाई दिए।शाम के समय कई कर्मचारी और अधिकारी खुद बेमन होकर खड़े दिखे। किसी ने कहा, “ना उमंग है, ना उद्देश्य, बस ड्यूटी निभाने आए हैं।” यह वाक्य राज्योत्सव की वास्तविक स्थिति को बयां करने के लिए पर्याप्त था। प्रशासनिक उदासीनता और अव्यवस्था की झलक हर कोने में साफ दिख रही थी।दर्शकों की भीड़ भले मौजूद थी, लेकिन उनमें आकर्षण और जुड़ाव की कमी थी। कई लोग यह सवाल करते नजर आए — “क्या ये उत्सव जनता के लिए है या सिर्फ दिखावे के लिए?” मंच पर जहां औपचारिक भाषण और सम्मान समारोह चल रहे थे, वहीं नीचे बैठे लोग असंतोष जाहिर कर रहे थे।कुछ जनप्रतिनिधियों ने मंच से बाहर अपनी नाराज़गी प्रकट करते हुए कहा कि “राज्योत्सव मनाने से विकास नहीं होता, जनता को काम चाहिए, योजनाओं का लाभ चाहिए।” कई सरपंचों और जनपद सदस्यों ने भी व्यंग्य करते हुए कहा कि “चुनाव जीतने के बाद नेता अपनी ही पंचायतों का हाल तक नहीं पूछते।”इस दौरान चर्चा यह भी रही कि राजधानी में प्रधानमंत्री की सभा में शामिल होने गए समर्थक मायूस होकर लौटे। लोगों का कहना था कि “जोश देखने गए थे, पर निराशा लेकर लौटे।”बालोद जिला का यह राज्योत्सव प्रशासनिक उदासीनता और अव्यवस्थित प्रबंधन का उदाहरण बन गया। मंच की चमक-दमक के बावजूद जमीनी सच्चाई छिपी नहीं रह सकी। उत्सव का उद्देश्य जहां जनता की भागीदारी होना चाहिए था, वहीं यह आयोजन ठेकेदारों और अधिकारियों की औपचारिकता तक सीमित रह गया।अब सवाल यह उठता है कि क्या राज्योत्सव जैसे बड़े आयोजनों से जनता को वास्तव में जोड़ने की कोशिश की जाएगी, या यह परंपरा केवल भाषणों और दिखावे की रस्म बनकर रह जाएगी। बालोद के नागरिक उम्मीद करते हैं कि आने वाले वर्षों में यह उत्सव वास्तव में “जन का उत्सव” बने, न कि “प्रबंधन का प्रदर्शन।”

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