भरथरी गायिका गुनित साहू की स्वर साधना में लोकआस्था की गूंज, छत्तीसगढ़ की आध्यात्मिक विरासत को दे रहीं नई पहचान
भक्ति, अध्यात्म और लोकजीवन की संवेदनाओं को भरथरी गायन से जीवंत कर रहीं गुनित साहू परंपरा की संवाहक महिला कलाकारों को सम्मान, सशक्त मंच और संरक्षण देने की जरूरत

संपादक:- मीनू साहू
छत्तीसगढ़। लोककला केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समाज की आत्मा, पूर्वजों की विरासत और पीढ़ियों से संचित आध्यात्मिक चेतना की जीवंत अभिव्यक्ति है। छत्तीसगढ़ की इसी समृद्ध परंपरा में भरथरी गायन का विशिष्ट स्थान है। इस विधा को अपनी गायकी के माध्यम से जनमानस तक पहुंचाने वाली लोकगायिका गुनित साहू की सहभागिता सांस्कृतिक जगत के लिए महत्वपूर्ण है। उनके जैसे कलाकारों की उपस्थिति यह संदेश देती है कि आधुनिकता की तेज रफ्तार के बीच भी लोकपरंपराओं की जड़ें समाज में गहराई तक मौजूद हैं।भरथरी गायन की आत्मा में राजा भरथरी की लोकगाथा, वैराग्य की भावना, सांसारिक मोह से मुक्ति का चिंतन और आध्यात्मिक सत्य की खोज समाहित है। यह गायन श्रोताओं को केवल कथा नहीं सुनाता, बल्कि जीवन के वास्तविक उद्देश्य, मानवीय मूल्यों और आत्मचिंतन की ओर भी प्रेरित करता है। जब लोकस्वर में विरह, वैराग्य और भक्ति की अनुभूति उतरती है, तब श्रोता मनोरंजन से आगे बढ़कर भावनात्मक एवं आध्यात्मिक जुड़ाव महसूस करते हैं।गुनित साहू की भागीदारी इसी लोकधारा की निरंतरता का महत्वपूर्ण प्रतीक है। भरथरी जैसी पारंपरिक गायन विधा में महिला कलाकारों की सक्रिय उपस्थिति इस धारणा को मजबूती देती है कि लोकसंस्कृति के संरक्षण में प्रतिभा, साधना और समर्पण का महत्व सर्वोपरि है। लोकगायिकाएं अपनी कला के माध्यम से सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने में योगदान देती हैं। उनके स्वर में लोकजीवन की संवेदनाएं, सामाजिक अनुभव और आस्था से जुड़े भाव अभिव्यक्ति पाते हैं।आज जब मनोरंजन के आधुनिक माध्यमों का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है, तब पारंपरिक लोककलाओं के सामने नई पीढ़ी को जोड़ने की चुनौती भी खड़ी है। ऐसे समय में गुनित साहू जैसे कलाकारों को प्रोत्साहन देना केवल किसी एक प्रतिभा का सम्मान नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने की दिशा में सार्थक पहल है।लोककला के साधकों को तालियों के साथ अधिकार और सम्मान भी मिलना चाहिए। उन्हें पर्याप्त मंच, नियमित अवसर, आर्थिक सुरक्षा तथा नई पीढ़ी को प्रशिक्षण देने की सुविधाएं उपलब्ध कराना जरूरी है। सरकार, सांस्कृतिक संस्थाओं और समाज को मिलकर ऐसी व्यवस्था विकसित करनी चाहिए, जिससे पारंपरिक कलाकार अपनी कला को जीवित रखने के लिए आर्थिक संघर्ष तक सीमित न रह जाएं।गुनित साहू की भरथरी गायन में सहभागिता इसी व्यापक सोच की ओर ध्यान खींचती है। लोकस्वरों में हमारी जड़ों की पहचान बसती है। इन स्वरों को बचाना अपनी संस्कृति, आध्यात्मिक चेतना और आने वाली पीढ़ियों की विरासत को सुरक्षित रखना है। जब तक लोकगाथाएं गूंजती रहेंगी, तब तक छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक आत्मा जीवंत रहेगी।



