धान पर पहरा, किसान बेबस भ्रष्टाचारी सरकारी नीतियों के खिलाफ आम आदमी पार्टी का तीखा प्रहार

बालोद :- छत्तीसगढ़ में धान उपार्जन अब व्यवस्था नहीं, बल्कि किसानों की सहनशक्ति की परीक्षा बन चुका है। खेत से निकला अन्न मंडी तक पहुंचने से पहले ही लालफीताशाही, तकनीकी शर्तों और सरकारी हठधर्मिता में उलझकर दम तोड़ रहा है। आम आदमी पार्टी ने इसे सीधे तौर पर “किसान विरोधी साजिश” करार देते हुए सरकार पर तीखा हमला बोला है।आम आदमी पार्टी के प्रदेश नेतृत्व का कहना है कि मौजूदा शासन किसानों को राहत देने के बजाय उन्हें शक की निगाह से देख रहा है। खरीदी केंद्रों पर ऐसे हालात बना दिए गए हैं, मानो किसान अन्न बेचने नहीं, कोई अपराध करने पहुंचा हो। हर कदम पर पहचान, निगरानी और रोक-टोक—यह खेती नहीं, बल्कि नियंत्रण की राजनीति है।पार्टी के किसान प्रकोष्ठ के अनुसार, इस बार खरीदी प्रक्रिया देर से शुरू हुई, अव्यवस्थाओं से घिरी रही और अब उसे जल्दबाजी में समेटने की कोशिश हो रही है। इससे हजारों किसानों की उपज बाहर रह जाने का खतरा मंडरा रहा है। पार्टी ने स्पष्ट कहा कि जब परिवहन और प्रशासन—दोनों मोर्चों पर विफलता रही, तो जिम्मेदारी किसानों पर क्यों थोपी जा रही है?नेताओं ने सवाल उठाया कि जिन किसानों की जमीन, फसल या पंजीयन से जुड़ी त्रुटियां अब तक दूर नहीं हो पाईं, उनका क्या दोष? क्या सरकार चाहती है कि किसान अपनी मेहनत का अन्न खेत में सड़ा दें? पार्टी का आरोप है कि खरीदी की सीमा और नियमों को जानबूझकर कठोर रखा गया है ताकि कम से कम धान उठे और आंकड़ों का खेल साधा जा सके।भुगतान प्रणाली को लेकर भी सरकार कठघरे में है। पार्टी का कहना है कि किसानों को अपनी ही कमाई पाने के लिए एक तय बैंक ढांचे में कैद कर दिया गया है। जरूरत के समय पूरी राशि न मिलना, छोटे-छोटे हिस्सों में भुगतान—यह किसानों की आर्थिक आज़ादी पर सीधा प्रहार है। खेती के खर्च, कर्ज, मजदूरी—इन सबका इंतजार किस्तों में नहीं होता।खरीदी केंद्रों की बदहाली पर भी पार्टी ने जमकर निशाना साधा। न पीने के पानी की समुचित व्यवस्था, न शौचालय, न बैठने की जगह—घंटों कतार में खड़े किसान अपमानित महसूस कर रहे हैं। ऊपर से परिवहन और उठाव में देरी ने हालात और विस्फोटक बना दिए हैं। जहां धान ढेर लगा है, वहीं व्यवस्था ढेर होती दिख रही है।आम आदमी पार्टी ने यह भी आरोप लगाया कि जानबूझकर देरी से आदेश और अनुबंध किए गए, ताकि केंद्रों पर अव्यवस्था फैले और किसान थककर पीछे हट जाएं। इसका खामियाजा न केवल किसानों को, बल्कि सहकारी संस्थाओं को भी उठाना पड़ रहा है, जिन्हें नुकसान की भरपाई आज तक नहीं मिली।पार्टी ने सरकार को दो टूक चेतावनी दी है कि यदि अन्नदाता की अनदेखी बंद नहीं हुई, तो सड़कों पर जवाब दिया जाएगा। यह संघर्ष केवल धान का नहीं, किसान के सम्मान, अधिकार और अस्तित्व का है। यदि शासन ने अब भी कान नहीं खोले, तो आने वाले दिन सत्ता के लिए बेहद असहज साबित होंगे। इस विशेष जानकारी को हमें मीडिया प्रभारी पंकज जैन एवं किसान मोर्चा के अध्यक्ष तारेंद्र चंद्राकर ने दिया है।



