हमर छत्तीसगढ़

डौंडीलोहारा ब्लॉक शिक्षा अधिकारी हिमांशु मिश्रा का खेल प्रशिक्षण या षड्यंत्र? FLN के नाम से ताक पर बच्चों का भविष्य

 

बालोद:- छत्तीसगढ़ में बालोद जिले के डौंडीलोहारा विकासखंड में शिक्षा के नाम पर जो प्रयोग चल रहा है, वह सुधार नहीं बल्कि सुनियोजित विनाश की पटकथा जैसा प्रतीत होता है। सूत्रों से पता चला है कि ब्लॉक अधिकारी हिमांशु मिश्रा द्वारा FLN (Foundational Literacy and Numeracy) प्रशिक्षण के नाम पर जो व्यवस्था लागू की गई है, उसने न केवल शिक्षकों को कागजी गतिविधियों में उलझा दिया है, बल्कि हजारों बच्चों को पढ़ाई से भटका कर उनके भविष्य के साथ खुला खिलवाड़ किया जा रहा है। सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक शिक्षकों को प्रशिक्षण में बैठा दिया जाता है। सवाल यह है कि जब शिक्षक प्रशिक्षण कक्ष में बंद हैं, तो स्कूलों में बच्चे किसके भरोसे छोड़े गए हैं? परीक्षा सिर पर है, पाठ्यक्रम अधूरा है, और इस निर्णायक समय में कक्षाएं शिक्षकविहीन होकर भटकाव का केंद्र बन चुकी हैं। यह प्रयोग शैक्षणिक सुधार नहीं, बल्कि बच्चों को जानबूझकर कमजोर करने की रणनीति जैसा दिखता है।FLN का उद्देश्य बुनियादी शिक्षा को मजबूत करना है, लेकिन यहां इसका उल्टा परिणाम सामने आ रहा है। प्रशिक्षण का समय, तरीका और नियोजन ऐसा है कि शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ ही तोड़ दी गई है। शिक्षक मजबूरी में प्रशिक्षण में शामिल हो रहे हैं, स्कूलों में ताले नहीं लगे हैं लेकिन पढ़ाने वाला कोई नहीं है। क्या यही नई शिक्षा नीति की आत्मा है? या फिर यह केवल लाखों रुपये के खेल को जायज ठहराने का हथकंडा?सबसे गंभीर सवाल यह है कि जब लाखों-करोड़ों के कथित घोटालों की गूंज पहले से शिक्षा विभाग के गलियारों में सुनाई दे रही है, तब भी हिमांशु मिश्रा पर जांच क्यों नहीं? क्या जिला प्रशासन का संरक्षण इतना मजबूत है कि बच्चों के भविष्य की बलि देकर भी अधिकारी सुरक्षित रह सकें? यह चुप्पी केवल लापरवाही नहीं, बल्कि मिलीभगत की ओर इशारा करती है।यह पूरा प्रयोग देश की प्रतिष्ठा पर भी सवाल खड़ा करता है। जिस राष्ट्र की नींव उसके बच्चों की शिक्षा पर टिकी हो, वहां अगर योजनाओं का उपयोग धन उगाही और आंकड़ों की बाजीगरी के लिए किया जाए, तो आने वाली पीढ़ी किस दिशा में जाएगी? कमजोर शिक्षा प्रणाली केवल व्यक्तिगत नुकसान नहीं करती, बल्कि राष्ट्र की बौद्धिक क्षमता को भी खोखला कर देती है।यहां न शिक्षक दोषी हैं, न बच्चे। जिम्मेदारी उन अधिकारियों की है जो बिना जमीनी हकीकत समझे आदेश थोपते हैं और प्रशिक्षण को व्यापार बना देते हैं। अगर यही सिलसिला चलता रहा, तो FLN इतिहास में एक शैक्षणिक सुधार के रूप में नहीं, बल्कि बच्चों को भटकाने वाले सबसे खतरनाक प्रयोग के रूप में दर्ज होगा।अब सवाल यह नहीं है कि इस प्रयोग को क्या कहा जाए, सवाल यह है कि इसे कब रोका जाएगा। क्या प्रशासन जागेगा, या फिर बच्चों का भविष्य इसी तरह फाइलों, प्रशिक्षण हॉल और भ्रष्ट सोच के बीच कुचला जाता रहेगा? अगर आज जवाबदेही तय नहीं हुई, तो आने वाले कल में इसकी कीमत पूरा समाज चुकाएगा।

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