हमर छत्तीसगढ़

बेटी की सुरक्षा या कागजी पहरा? पीसीपीएनडीटी कानून की असली तस्वीर

 

संपादक:- मीनू साहु 

रिपोर्टर:- उत्तम साहु

बालोद:- देश के साथ साथ छत्तीसगढ़ के बालोद जिला में बेटियों के अधिकारों और सम्मान की रक्षा के लिए बनाया गया Pre-Conception and Pre-Natal Diagnostic Techniques (PCPNDT) Act कानून एक मजबूत संकल्प का प्रतीक है। इसका उद्देश्य साफ है—गर्भ में पल रही बच्चियों को बचाना और समाज में फैल चुकी लिंग जांच की कुप्रथा को खत्म करना। कागजों में यह कानून सख्त है, नियम कठोर हैं और सजा भी कड़ी है। लेकिन सवाल यह है कि जमीन पर इसकी तस्वीर कितनी मजबूत है?कानून के तहत हर जिले में एक समिति बनाई जाती है, जो अल्ट्रासाउंड सेंटर और मेडिकल संस्थानों पर नजर रखती है। यह व्यवस्था इसलिए बनाई गई ताकि कोई भी व्यक्ति गर्भ में पल रहे शिशु का लिंग पता करने की कोशिश न कर सके। जब यह कानून प्रभावी ढंग से लागू होता है, तब यह सचमुच बेटियों की ढाल बन जाता है। कई जगहों पर प्रशासन की सक्रियता से अवैध लिंग जांच करने वाले केंद्रों पर कार्रवाई हुई है और यह संदेश गया है कि कानून से ऊपर कोई नहीं।लेकिन दूसरी तरफ एक कड़वी सच्चाई भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कई बार यही कानून ईमानदारी से काम करने वाले डॉक्टरों और मेडिकल संस्थानों के लिए परेशानी का कारण भी बन जाता है। छोटी-छोटी तकनीकी गलतियों को भी अपराध की तरह देखा जाता है, फॉर्म की एक लाइन गलत भरने पर क्लीनिक सील हो जाते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या व्यवस्था का मकसद अपराध रोकना है या ईमानदार लोगों को उलझाना?कई विशेषज्ञों का मानना है कि कानून की मंशा जितनी पवित्र है, उसकी क्रियान्वयन प्रक्रिया उतनी ही उलझी हुई दिखाई देती है। कुछ जगहों पर निगरानी समितियां केवल औपचारिकता बनकर रह जाती हैं। बैठकें होती हैं, फाइलें चलती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर अवैध गतिविधियों पर निर्णायक प्रहार कम ही देखने को मिलता है।यही वजह है कि समाज में दो तरह की आवाजें सुनाई देती हैं। एक आवाज कहती है कि यह कानून बेटियों की जिंदगी बचाने का सबसे बड़ा हथियार है। दूसरी आवाज सवाल करती है कि क्या इस हथियार की धार सही दिशा में चल रही है?सच्चाई शायद इन दोनों के बीच कहीं खड़ी है। कानून की जरूरत भी है और उसके क्रियान्वयन में सुधार भी जरूरी है। जब निगरानी व्यवस्था पारदर्शी, निष्पक्ष और जिम्मेदार बनेगी, तभी यह कानून अपने असली उद्देश्य को पूरा कर पाएगा।आखिरकार मुद्दा सिर्फ कानून का नहीं, बल्कि समाज की सोच का है। जिस दिन हर परिवार बेटी को बोझ नहीं बल्कि सम्मान समझेगा, उस दिन किसी कानून की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। तब पीसीपीएनडीटी केवल एक अधिनियम नहीं, बल्कि एक सफल सामाजिक परिवर्तन की कहानी बन जाएगा

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