हमर छत्तीसगढ़

बालोद के कलाकारों का परचम गोंडवाना भवन में राज्य स्तरीय दाऊ रामचंद्र देशमुख अलंकरण से सम्मानित हुए 6 प्रतिभाएं

भारतीय दलित साहित्य अकादमी और छत्तीसगढ़ साथी का संयुक्त आयोजन, नवोदित लोकगायिका हर्षिता कोठारी सहित जिले के लोककलाकारों को मिला बड़ा मंच

संपादक :- मीनू साहू 

डौंडीलोहारा/बालोद:- छत्तीसगढ़ की माटी में रची-बसी लोककला को नई पहचान दिलाने वाले बालोद जिले के कलाकारों ने राज्य स्तर पर जिले का मान बढ़ाया है। धमतरी स्थित गोंडवाना भवन में आयोजित गरिमामय समारोह में कला के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए बालोद के 6 कलाकारों को प्रतिष्ठित दाऊ रामचंद्र देशमुख राज्य अलंकरण से सम्मानित किया गया।

यह सम्मान समारोह भारतीय दलित साहित्य अकादमी छत्तीसगढ़ और साप्ताहिक छत्तीसगढ़ साथी धमतरी के संयुक्त तत्वावधान में संपन्न हुआ। कार्यक्रम की मुख्य अतिथि अकादमी की संरक्षक सुशीला देवी वाल्मीकि और प्रांताध्यक्ष प्रो. जी.आर. बंजारे ज्वाला के करकमलों से कलाकारों को सम्मान पत्र एवं प्रतीक चिन्ह प्रदान किया गया।

सम्मानित कलाकारों में ग्राम धनगांव के द्वारिका प्रसाद कश्यप (तबला वादक), जगन्नाथपुर साकरा के विनोद कुमार यादव (लोकनृत्य, शहनाई, बांस वादक), ग्राम भोईनापर के संतराम आसनिक (अभिनय एवं गीतकार), ग्राम सुरेगांव के पुरनलाल महादेवा (उद्घोषक एवं अभिनय), गंगा मिले सागर से जून्नापानी चिखलाकसा राजनांदगांव के चंदूलाल पटेल (तबला, नाल वादक, नाचा मैनेजर) शामिल हैं।

समारोह का विशेष आकर्षण रहीं डौंडीलोहारा विकासखंड के ग्राम फिरतुटोला (नंगुटोला) की नवोदित लोकगायिका हर्षिता कोठारी। लोक सिरजन सांस्कृतिक संस्था से जुड़ी हर्षिता ने अपने पिता, छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध गीतकार, लोकगायक एवं फिल्म संगीतकार विष्णु कोठारी ‘मीत’ से प्रेरणा लेकर लोकगायन में अपनी अलग पहचान बनाई है।

हर्षिता ने अपने गांव के इतिहास पर आधारित ‘फिरतुटोला हे मोर गांव’ जैसे गीत को अपनी आवाज दी है, जो बुजुर्गों की स्मृतियों और गांव की विरासत को सहेजता है। यह गीत अब फिरतुटोला की सांस्कृतिक पहचान बन गया है और आने वाली पीढ़ी के लिए अमर धरोहर के रूप में देखा जा रहा है।

यह उपलब्धि केवल व्यक्तिगत सम्मान नहीं, बल्कि बालोद जिले की समृद्ध लोकपरंपरा के संरक्षण का प्रतीक है। इस उपलब्धि का श्रेय अपने गुरु विष्णु कोठारी ‘मीत’ और आयोजक संस्थाओं को दिया और आभार व्यक्त किया।

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