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पत्रकारिता पर कलंक अधिकारी मना रहे पर्व, शर्मिंदा हो रहा चौथा स्तंभ!

पत्रकारिता पर कलंक अधिकारी मना रहे पर्व, शर्मिंदा हो रहा चौथा स्तंभ!

विशेष रिपोर्ट:- मोहन निषाद

बालोद:- छत्तीसगढ़ में त्योहारों का मौसम शुरू होते ही सरकारी विभागों में “त्योहारी रौनक” के साथ-साथ बालोद जिला में एक नया खेल भी शुरू हो जाता है बिल पास करने और “मिठाई वितरण” का। विभागों में दिखावे की पारदर्शिता और अंदरूनी साजिशें अब खुलकर सामने आने लगी हैं। जहां अधिकारी त्योहार की खुशियों में “सहयोग” के नाम पर रकम का लेन-देन कर रहे हैं, वहीं सच्चे पत्रकारों को अपमान का सामना करना पड़ रहा है।जानकारी के अनुसार, जिले के कई कार्यालयों में पत्रकारों को “मिठाई के नाम पर सहयोग” देते समय महज कुछ रुपये थमाए जा रहे हैं, लेकिन सरकारी रजिस्टर में उसी को पाँच गुना बढ़ाकर दर्ज किया जा रहा है। यह खेल सिर्फ वित्तीय अनियमितता नहीं, बल्कि पत्रकारिता की गरिमा पर भी प्रहार है।कुछ अधिकारी और कर्मचारी पत्रकारों की एकजुटता तोड़ने में लगे हुए हैं। वहीं, कुछ स्वार्थी और चाटुकार पत्रकार इस षड्यंत्र में अनजाने या जानबूझकर सहभागी बन रहे हैं। ऐसे लोग व्यवस्था की सच्चाई उजागर करने वाले ईमानदार पत्रकारों को नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं।ईमानदार कलमकार, जो जमीन पर उतरकर जनता की आवाज़ उठाते हैं, आज किनारे कर दिए गए हैं। उनकी जगह उन लोगों ने ले ली है, जो कैमरे और कलम का इस्तेमाल “स्वार्थ के सौदे” के लिए कर रहे हैं। अधिकारी वर्ग के लिए अब ऐसे “सुविधाभोगी पत्रकार” किसी कवच से कम नहीं हैं।सम्मान का भी स्तर गिर चुका है। जहां पत्रकारों को इज्जत मिलना चाहिए, वहीं अब उन्हें मिठाई के बहाने अपमान का स्वाद चखाया जा रहा है। इस रवैये से प्रशासन यह जताना चाहता है कि पत्रकारिता अब उनके इशारों पर नाचेगी लेकिन सवाल यही है — क्या पत्रकारिता का मोल अब मिठाई के डिब्बों और नकली रजिस्टरों में सिमट गया है? क्या सच्चे पत्रकार अपने आत्मसम्मान को कुछ सिक्कों के बदले बेच देंगे?पत्रकारिता का धर्म हमेशा “सत्ता से सवाल करना” रहा है, न कि सत्ता की सेवा करना। आज जरूरत है कि सच्चे पत्रकार अपनी एकता बनाए रखें और उन चेहरों को बेनकाब करें जो इस पेशे को कलंकित कर रहे हैं।सच्ची पत्रकारिता वही है जो सच के साथ खड़ी रहे — चाहे सामने सत्ता हो या सजा।

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