महुआ की लूट, कानून की चुप्पी अरकार गांव में कथित अवैध कारोबार पर प्रशासनिक संरक्षण के गंभीर सवाल

बालोद/पलारी:- छत्तीसगढ़ के बालोद जिले के गुरूर विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत अरकार, थाना सनौद क्षेत्र से एक चौंकाने वाला मामला सामने आ रहा है। गांव के ही निवासी दिलीप कोसरे, पिता चन्द्रकुमार कोसरे पर आरोप है कि वे अपने घर में महुआ फूल—जिससे देशी कच्ची शराब तैयार की जाती है—को ट्रक-दर-ट्रक मंगाकर भंडारण और बिक्री कर रहे हैं। ग्रामीणों और स्थानीय सूत्रों का कहना है कि इस गतिविधि के लिए वन विभाग से कोई वैध लाइसेंस नहीं है, फिर भी यह सिलसिला बेखौफ जारी है।
यह केवल एक व्यक्ति का प्रश्न नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन की उस ढिलाई का आईना है, जिसने अवैधता को पनपने का अवसर दिया। जिस महुआ को आदिवासी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का संवेदनशील संसाधन माना जाता है, उसी महुआ का कथित रूप से व्यावसायिक दोहन कर समाज को नशे की आग में झोंका जा रहा है। आरोपों के मुताबिक, यह कारोबार खुलेआम चलता है—और यही खुलापन प्रशासनिक मौन पर सबसे बड़ा तमाचा है।महुआ फूल का अनियंत्रित संग्रह और भंडारण प्रशासनिक तंत्र पर सीधा प्रहार है। इससे प्राकृतिक पुनर्जनन बाधित होता है, जैव विविधता को क्षति पहुंचती है और वन्य जीवों का खाद्य चक्र प्रभावित होता है। इसके बाद इसी महुआ से बनने वाली कच्ची शराब सामाजिक ताने-बाने को तोड़ती है—घरेलू हिंसा, सड़क दुर्घटनाएं, स्वास्थ्य संकट और अपराध की श्रृंखला को जन्म देती है। यह जहर धीरे-धीरे गांवों की नसों में उतरता है, और कीमत चुकाता है गरीब परिवारों का भविष्य।सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि यदि आरोप सही हैं, तो कार्रवाई क्यों नहीं? ग्रामीणों में चर्चा है कि कथित संरक्षण के कारण हौसले बुलंद हैं। यदि ऐसा है, तो यह संरक्षण किसका है—और किस कीमत पर? क्या कानून केवल कागजों में सिमट गया है? क्या निरीक्षण, छापे और जब्ती केवल दिखावे भर हैं? जब बिना लाइसेंस इतना बड़ा कथित संचालन संभव है, तो जवाबदेही किसकी बनेगी?यह लेख किसी को दोषी ठहराने का फैसला नहीं सुनाता, बल्कि प्रशासन से जवाब मांगता है। वन विभाग, आबकारी, पुलिस और राजस्व—सभी की संयुक्त जिम्मेदारी है कि तथ्यों की निष्पक्ष जांच हो। लाइसेंस की स्थिति सार्वजनिक की जाए, स्रोतों की पड़ताल हो, भंडारण और परिवहन की वैधता परखी जाए, और यदि नियमों का उल्लंघन पाया जाए तो कठोरतम कार्रवाई हो।शासन का कर्तव्य है कि वह नशे के नेटवर्क पर प्रहार करे, न कि आंखें मूंदे। यदि आज चेतावनी अनसुनी रही, तो कल गांव-गांव में महुआ नहीं, मातम उगेगा। कानून की ताकत तभी विश्वसनीय है, जब वह निर्भीक होकर लागू हो। गुरूर की धरती जवाब मांग रही है—अब चुप्पी नहीं, ठोस कार्रवाई चाहिए।



