हमर छत्तीसगढ़

गुरूर ब्लॉक के खुंदनी धान खरीदी केंद्र पर उठे गंभीर सवाल, कथित संरक्षण ने खोली भ्रष्ट तंत्र की परतें

संवाददाता :- रिखी साहू

बालोद/गुरूर:—छत्तीसगढ़ के बालोद जिला में गुरूर विकासखंड का खुंदनी धान खरीदी केंद्र अब सिर्फ अव्यवस्था का प्रतीक नहीं रहा, बल्कि सत्ता-संरक्षण और प्रशासनिक मिलीभगत के गंभीर आरोपों का केंद्र बन चुका है। किसानों के बीच सबसे अधिक चर्चा में एक नाम है—भाजपा मंडल अध्यक्ष टुकेश्वर पांडे। आरोप है कि उनके कथित प्रभाव और संरक्षण में ही समिति प्रबंधक और प्राधिकृत अधिकारी बेलगाम होकर किसानों के हितों से खिलवाड़ कर रहे हैं।स्थानीय किसानों का कहना है कि जिस तरह से भ्रष्टाचार के आरोप झेल रहे समिति प्रबंधक और प्राधिकृत अधिकारी पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो रही, उससे यह संदेह और गहराता जा रहा है कि उन्हें राजनीतिक ढाल प्राप्त है। किसानों के बीच यह धारणा बन चुकी है कि यह ढाल सीधे मंडल स्तर से मिल रही है, जिसके चलते जिम्मेदार अधिकारी जवाबदेही से बचते फिर रहे हैं।सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि धान खरीदी केंद्र पर ताला जड़ देना और उसे “कलेक्टर का आदेश” बताकर टालना—यह प्रशासनिक प्रक्रिया से अधिक जिम्मेदारी से बचने की रणनीति प्रतीत होती है। यदि वास्तव में आदेश हैं, तो उन्हें सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया? और यदि नहीं, तो किसके इशारे पर किसानों की रोज़ी-रोटी पर ताला लगाया गया?किसान संतोष साहू और जीवराखान का साफ कहना है कि जब भी उन्होंने खरीदी शुरू करने की मांग की, उन्हें घुमा-फिराकर एक ही जवाब मिला—“ऊपर से आदेश है।” यह “ऊपर” कौन है, इसका नाम कोई नहीं लेता, लेकिन उंगलियां बार-बार मंडल अध्यक्ष टुकेश्वर पांडे की ओर उठती हैं। यही चुप्पी आज सबसे बड़ा आरोप बन चुकी है।जिस सरकार ने खुद को किसान हितैषी बताकर सत्ता पाई, उसी शासनकाल में यदि किसान धान बेचने के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि नीतिगत पतन का संकेत है। भाजपा के भीतर बैठे जनप्रतिनिधियों की चुप्पी और कथित हस्तक्षेप ने “सुशासन” को “कुशासन” में बदल दिया है—ऐसा किसान खुलकर कह रहे हैं।अब सवाल स्पष्ट हैं—क्या समिति प्रबंधक चेतन साहू और प्राधिकृत अधिकारी मिथलेश साहू को मिले कथित संरक्षण की परतें खोली जाएंगी?या फिर किसान यूं ही ताले लगे केंद्रों के सामने न्याय की भीख मांगते रहेंगे?समय आ गया है कि शासन केवल बयान नहीं, कठोर कार्रवाई करे। उच्चस्तरीय जांच, जिम्मेदारों का निलंबन और धान खरीदी की तत्काल बहाली—यही किसानों की न्यूनतम मांग है। यदि अब भी सत्ता ने आंखें मूंदे रखीं, तो खुंदनी की आग दूर तक जाएगी और जवाबदेही तय होकर ही रहेगी।

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