सूचना से परहेज या सच से डर? बालोद में सूचना के अधिकार के तहत जानकारी नहीं देना सबसे बड़ा सबूत

बालोद:- छत्तीसगढ़ के बालोद जिला में शिक्षा विभाग द्वारा सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 के तहत मांगी गई वैधानिक जानकारी उपलब्ध न कराना न केवल कानून की अवहेलना है, बल्कि यह शासकीय कार्यप्रणाली की पारदर्शिता, जवाबदेही और ईमानदारी पर सीधा प्रहार है। प्रस्तुत आवेदन का उद्देश्य होता है कि तथ्यात्मक सूचनाओं के माध्यम से सत्य को सामने लाना और संभावित अनियमितताओं की जांच सुनिश्चित करना है।सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 के तहत दिनांक 16.06.2021 से 31.04.2022 तक सहायक विकासखण्ड शिक्षा अधिकारी बालोद के अधिकारी मोहनी को भुगतान करने के पूर्व या पश्चात् जिस शासकीय वाहन से कार्य स्थल पर गये थे उस-उस दिन का दौरा दैनंदनी प्रतिवेदन प्रस्तावित अनुमोदित एवं शासकीय वाहन के लागबुक तथा शासकीय कार्य हेतु वाहन में डाले गये पेट्रोल या डीजल के बिल व्हाऊचर एवं वाहन चालक के नाम की जानकारी तथा उस समय जो-जो लोग उस वाहन पे उपस्थित थे उन कर्मचारियों का नाम की जानकारी की सत्यापित प्रमाणित प्रति मांगा गया है। जिसे दिया नहीं जा रहा है तो समझ सकते हैं कि क्या क्या घपला हुआ होगा न जाने ABO पद में कितना भ्रष्टाचार किया होगा जो सूचना के अधिकार के तहत जानकारी देने आना कानी कर रही है।सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 3 प्रत्येक नागरिक को सूचना प्राप्त करने का अधिकार देती है। धारा 4(1)(a) के अनुसार प्रत्येक लोक प्राधिकरण का दायित्व है कि वह अपने अभिलेख सुव्यवस्थित रूप से संधारित करे ताकि सूचना आसानी से उपलब्ध कराई जा सके। धारा 6(1) के अंतर्गत आवेदक द्वारा मांगी गई सूचना उपलब्ध कराना अनिवार्य है, जबकि धारा 7(1) स्पष्ट करती है कि 30 दिवस के भीतर सूचना प्रदान की जानी चाहिए।यदि सूचना देने में अनावश्यक विलंब, टालमटोल या इनकार किया जाता है, तो यह धारा 20 के तहत दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है, जिसमें संबंधित लोक सूचना अधिकारी पर अर्थदंड एवं विभागीय कार्रवाई का प्रावधान है।शासकीय वाहन का उपयोग, यात्रा विवरण, दौरा दैनंदनी, लागबुक, ईंधन बिल, वाहन के भुगतान वाउचर, वाहन चालक का नाम तथा वाहन में उपस्थित कर्मचारियों की जानकारी – ये सभी शासकीय अभिलेख हैं। इनका अस्तित्व और संधारण अनिवार्य है। यदि यह जानकारी उपलब्ध नहीं कराई जा रही है, तो स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि कहीं अभिलेख जानबूझकर छिपाए तो नहीं जा रहे?सूचना न देना यह संकेत देता है कि या तो नियमों के विरुद्ध भुगतान हुआ है, या फिर शासकीय संसाधनों का दुरुपयोग किया गया है। यही कारण है कि सूचना देने से बचने की प्रवृत्ति संभावित घपले, वित्तीय अनियमितता और भ्रष्टाचार की ओर इशारा करती है।
शिक्षा विभाग जैसे संवेदनशील विभाग से पारदर्शिता की अपेक्षा सबसे अधिक होती है। लोक सूचना अधिकारी एवं संबंधित विभाग का यह दायित्व है कि मांगी गई सूचना प्रमाणित प्रति के रूप में, उपलब्ध प्रारूप में, बिना किसी बहाने के प्रदान की जाए।यदि सूचना उपलब्ध नहीं कराई जाती है, तो यह न केवल अधिनियम का उल्लंघन है, बल्कि यह साबित करता है कि विभाग कानून से ऊपर समझने की भूल कर रहा है। ऐसी स्थिति में प्रथम अपील, द्वितीय अपील एवं राज्य सूचना आयोग के समक्ष शिकायत प्रस्तुत करना पूरी तरह न्यायसंगत और वैधानिक होगा।सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 कोई औपचारिकता नहीं, बल्कि लोकतंत्र का मजबूत हथियार है। जानकारी देने से इनकार करना सीधे-सीधे यह स्वीकार करना है कि कुछ न कुछ गलत अवश्य है। विभाग को चाहिए कि वह कानून के तहत मांगी गई समस्त जानकारी तत्काल उपलब्ध कराए, अन्यथा यह चुप्पी अपने आप में सबसे बड़ा आरोप बन रहा है।सूचना के अधिकार के कार्यकर्ता यशवंत निषाद का कहना है कि सूचना देने से इनकार या टालमटोल करना स्वयं में यह स्वीकार करने जैसा है कि अभिलेखों में गंभीर अनियमितताएं हैं। यदि विभाग के पास सब कुछ नियमसम्मत और वैध है, तो सूचना देने से डरने या बचने का कोई कारण नहीं होना चाहिए।



