बालोद /पलारी:- छत्तीसगढ़ में बालोद जिला के गुरुर विकासखंड अंतर्गत धमतरी–गुंडरदेही मार्ग पर बसे ग्राम सनौद धान खरीदी केंद्र, पलारी सेवा सहकारी समिति, में कलेक्टर के मौखिक आदेश से तहसीलदार गुरुर हनुमंत के द्वारा खरीदी बंद करवा दिया गया। इस निर्णय ने पलारी से लेकर आसपास के उन सभी किसानों को गहरे संकट में डाल दिया है, जो इसी समिति के अंतर्गत आते हैं। धान खरीदी जैसे संवेदनशील विषय पर बिना लिखित आदेश, बिना पारदर्शिता और बिना वैकल्पिक व्यवस्था के खरीदी बंद किया जाना प्रशासनिक मनमानी का प्रतीक बनकर सामने आया है।धान खरीदी केंद्र में खरीदी बंद होने के बाद किसान परेशान होकर समिति केंद्र पहुंचे, जहां किसानों ने गेट पर ताला लगा कर समिति प्रांगण में धरने पर बैठ गए । खेतों में खून–पसीना बहाने वाला किसान खुले आसमान के नीचे खड़ा होकर यह पूछने को मजबूर है कि वह अपना धान आखिर बेचे तो बेचे कहां। जिन केंद्रों पर भरोसा कर फसल बोई गई थी, वही केंद्र अब प्रशासनिक आदेशों की भेंट चढ़ चुके हैं।ऐसा सुनने में आ रहा है कि तहसीलदार द्वारा कई किसानों के रकबा का समायोजन कर दिया गया था। लेकिन जब वस्तु स्थिति की पड़ताल की गई तो चौंकाने वाला सच सामने आया। कई ऐसे किसान हैं, जिन्होंने अभी तक एक भी दाना नहीं बेचा है, जबकि उनके खातों का समायोजन हो चुका है। सबसे गंभीर बात यह है कि जिन किसानों का खाता समायोजन हुआ है, उन्हें स्वयं यह जानकारी तक नहीं है कि वे अब सोसायटी में धान बेच नहीं सकते। यह स्थिति केवल लापरवाही नहीं, बल्कि सुनियोजित अव्यवस्था की ओर इशारा करती है।किसानों का आरोप है कि सरकार और स्थानीय बीजेपी नेताओं के संरक्षण में प्राधिकृत अधिकारी के माध्यम से कूट रचित रचना रची जा रही है, ताकि किसानों को जानबूझकर परेशान किया जा सके। धान खरीदी जैसे जीवन–मरण के सवाल को राजनीतिक चालों और प्रशासनिक खेल का मैदान बना दिया गया है। यही वह चेहरा है जिसे विष्णु देव साय की तथाकथित किसान हितैषी सरकार के काम के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।स्थानीय किसानों का कहना है कि उन्होंने अपने जीवन में इससे घटिया सरकार और प्रशासन कभी नहीं देखा। किसान, जो अन्नदाता कहलाता है, आज खुद न्याय के लिए भटक रहा है। उसकी मेहनत, उसकी फसल और उसका हक़ सब कुछ सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया गया है। प्रशासनिक निर्णयों की मार सबसे पहले और सबसे ज्यादा किसान पर ही क्यों पड़ती है, इसका जवाब देने वाला कोई नहीं है।इस पूरे घटनाक्रम में कांग्रेस विधायक संगीता सिन्हा किसानों के पक्ष में खड़े होकर हितैषी बनकर सामने आए हैं। उन्होंने किसानों के साथ खड़े रहकर उनकी पीड़ा को आवाज़ दी है और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। किसानों को कम से कम इतना भरोसा मिला है कि उनकी बात सुनने और लड़ने वाला कोई तो है।सनौद धान खरीदी बंद होना केवल एक केंद्र का बंद होना नहीं है, बल्कि यह किसानों के भरोसे, उनके अधिकार और उनके सम्मान पर ताला लगने जैसा है। जब तक इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच नहीं होती, जब तक किसानों को बिना भ्रम और बाधा के धान बेचने का अधिकार नहीं मिलता, तब तक यह मुद्दा शांत नहीं हो सकता। यह लड़ाई केवल धान की नहीं, बल्कि किसान के स्वाभिमान और अस्तित्व की लड़ाई है।
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