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“बालोद खेल विभाग में सत्ता का दुरुपयोग? प्रशासनिक निर्णयों पर उठे गंभीर संवैधानिक सवाल”

 

बालोद:- छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में खेल विभाग से जुड़ा एक मामला प्रशासनिक पारदर्शिता, पदों की वैधानिकता तथा कार्यालयीन प्रक्रिया पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा कर रहा है। उपलब्ध जानकारी और स्थल से प्राप्त तस्वीरों से प्रतीत होता है कि खेल विभाग का संचालन असामान्य परिस्थितियों में किया जा रहा है, जिससे शासन की सेवा नियमावली, विभागीय संरचना तथा निर्वाचन संबंधी प्रावधानों के उल्लंघन की आशंका व्यक्त की जा रही है।
बताया जा रहा है कि जिले में खेल अधिकारी अथवा सहायक खेल अधिकारी के पदों पर राज्य शासन द्वारा नियमित नियुक्ति प्रक्रिया जारी नहीं की गई है। इसके बावजूद स्थानीय स्तर पर एक पद निर्मित कर उस पर नियुक्ति किए जाने का आरोप सामने आया है। यदि यह तथ्य सत्य पाया जाता है तो यह छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, सेवा भर्ती प्रक्रिया तथा वित्तीय स्वीकृति प्रणाली के प्रत्यक्ष उल्लंघन की श्रेणी में आ सकता है।

मामले का दूसरा और अधिक गंभीर पक्ष कार्यालय स्थानांतरण से जुड़ा है। आरोप है कि खेल विभाग का कार्यालय अपने मूल कक्ष से हटाकर उप जिला निर्वाचन अधिकारी के कक्ष में संचालित किया जा रहा है। निर्वाचन से संबंधित कक्षों का उपयोग केवल चुनावी कार्यों के लिए सीमित माना जाता है। ऐसे में यदि किसी अन्य विभाग को वहां स्थापित किया गया है, तो यह निर्वाचन कार्यप्रणाली की गोपनीयता, प्रशासनिक पृथक्करण तथा सरकारी परिसंपत्ति उपयोग नियमों के विरुद्ध माना जा सकता है।
फोटो में स्पष्ट दिख रहा है कि विभागीय कर्मचारी टेबल-कुर्सियों के अभाव में जमीन पर बैठकर फाइलें निपटा रहे हैं। यह स्थिति केवल अव्यवस्था नहीं बल्कि सरकारी कार्यालय संचालन के मानकों का खुला उल्लंघन है। कार्यालयीन कार्यकुशलता, अभिलेख सुरक्षा, तथा कर्मचारी कार्यस्थल मानक—तीनों ही बुनियादी प्रशासनिक सिद्धांत यहां कमजोर पड़ते दिखाई देते हैं।

यदि वास्तव में बिना शासन अनुमति पद सृजित हुआ है, कार्यालय जबरन स्थानांतरित हुआ है, तथा संसाधन विहीन स्थिति में काम चल रहा है, तो यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि पद के दुरुपयोग, अधिकार सीमा से बाहर निर्णय, तथा प्रशासनिक विवेकाधिकार के संभावित दुरुपयोग का मामला बन सकता है।

यह प्रकरण केवल एक विभाग तक सीमित नहीं है; यह जिला प्रशासन की जवाबदेही, प्रक्रिया-पालन और संस्थागत अनुशासन की परीक्षा है। आवश्यकता है कि इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच हो, आदेशों की वैधानिकता सार्वजनिक की जाए, तथा यदि कोई अनियमितता पाई जाए तो जवाबदेही तय की जाए। अन्यथा यह मामला भविष्य में प्रशासनिक अराजकता का उदाहरण बन सकता है।

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