हमर छत्तीसगढ़

जनदर्शन की भीड़ नहीं, सिस्टम की नाकामी का विस्फोट कागज़ी आदेशों की आड़ में कराहती ज़मीनी हकीकत

 

बालोद:- संयुक्त जिला कार्यालय में आयोजित जनदर्शन कार्यक्रम को प्रशासन भले राहत का मंच बताता हो, लेकिन सच्चाई इससे कहीं ज्यादा कड़वी है। कलेक्टर दिव्या उमेश मिश्रा के सामने उमड़ी भीड़ इस बात का खुला सबूत है कि ज़मीनी अमला अपनी जिम्मेदारी निभाने में नाकाम रहा है। जिस काम के लिए पंचायत, पटवारी, तहसील और विभागीय दफ्तर बने हैं, वही काम कराने के लिए लोगों को जिला मुख्यालय तक धक्के खाने पड़ रहे हैं।

डबरी सीमांकन, राशन कार्ड बनवाने और आवास पट्टा जैसी मांगें कोई असाधारण समस्या नहीं हैं। ये रोजमर्रा की प्रशासनिक जिम्मेदारियाँ हैं। लेकिन जब इन्हीं मूलभूत मुद्दों के लिए ग्रामीणों को महीनों दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ें, तो साफ हो जाता है कि नीचे बैठी व्यवस्था या तो सुस्त है, या फिर जानबूझकर काम टालती है। जनदर्शन में पहुँचे लोगों की लंबी कतार दरअसल उस ढीले सिस्टम की पोल खोलती है, जो फाइलें दबाकर बैठा रहता है और लोगों को थका देने की नीति पर चलता है।

हकीकत यह है कि जनदर्शन कई बार समाधान का मंच कम, शिकायतों का ढेर ज्यादा बन जाता है। अधिकारी मौके पर बुला लिए जाते हैं, निर्देश जारी हो जाते हैं, लेकिन जनता जानती है कि आदेश देना और आदेश लागू होना दो अलग बातें हैं। कागज़ पर कार्रवाई और जमीन पर बदलाव के बीच की दूरी अक्सर बहुत लंबी होती है। यही वजह है कि लोग अब भरोसे से ज्यादा संदेह लेकर ऐसे कार्यक्रमों में पहुँचते हैं।

सबसे बड़ा सवाल जवाबदेही का है। यदि राशन कार्ड या पट्टा का काम महीनों लटका रहता है, तो जिम्मेदार कर्मचारी पर क्या कार्रवाई होती है? आमतौर पर जवाब होता है — कुछ भी नहीं। यही ढिलाई व्यवस्था को बेलगाम बनाती है। जब तक काम टालने वालों पर सख्ती नहीं होगी, तब तक जनदर्शन केवल शिकायत सुनने का मंच बना रहेगा, समाधान का नहीं।

बालोद में हुआ यह आयोजन प्रशासन की सक्रियता दिखाने की कोशिश जरूर है, लेकिन यह भी उतना ही स्पष्ट करता है कि निचले स्तर पर व्यवस्था चरमराई हुई है। जनता अब मीठे शब्दों और औपचारिक बैठकों से आगे निकल चुकी है। उसे आदेश नहीं, नतीजे चाहिए; सहानुभूति नहीं, काम चाहिए।

यदि जनदर्शन के बाद भी हालात जस के तस रहे, तो यह कार्यक्रम राहत का नहीं, प्रशासनिक विफलता का प्रतीक बन जाएगा। जनता की निगाह अब घोषणाओं पर नहीं, कार्रवाई पर टिकी है — और यही असली परीक्षा है।

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