नवा रायपुर तक सिमटा सुशासन? बाकी छत्तीसगढ़ किसके भरोसे!

रिपोर्टर :- उत्तम साहू
बालोद/गुरूर : प्रदेश में सुशासन का शोर खूब सुनाई देता है, पर ज़मीनी तस्वीर कुछ और ही कहानी कहती है। ऐसा प्रतीित होता है मानो विकास की पूरी परिभाषा नवा रायपुर की चकाचौंध तक सीमित कर दी गई हो। चमकदार सड़कों, भव्य इमारतों और आधुनिक ढांचे को उपलब्धि बताकर सरकार अपनी पीठ थपथपा रही है, जबकि दूरस्थ अंचलों में बुनियादी जरूरतें आज भी अधूरी पड़ी हैं।
केंद्र और प्रदेश के मंत्री जब दौरे पर आते हैं तो उनकी गाड़ी सीधे नवा रायपुर की ओर मुड़ जाती है। वहीं योजनाओं की घोषणाएँ होती हैं, करोड़ों की सौगातें दी जाती हैं और तस्वीरें खिंचवाकर उपलब्धि का ढोल पीटा जाता है। सवाल उठता है कि क्या यही पूरा छत्तीसगढ़ है? क्या बालोद, गुरूर, बस्तर, सरगुजा, कांकेर और धमतरी इस नक्शे का हिस्सा नहीं हैं?
प्रदेश में 33 जिले, अनेक विकासखंड, नगरपालिकाएँ, पंचायतें और करोड़ों नागरिक निवास करते हैं। इन क्षेत्रों में आज भी पेयजल, स्वास्थ्य सुविधा, जर्जर सड़कें, शिक्षा संसाधन और रोजगार के अवसर जैसी मूलभूत आवश्यकताएँ अधूरी हैं। गांवों में किसान मौसम और बाजार दोनों की मार झेल रहे हैं। युवाओं को रोजगार के नाम पर सिर्फ आश्वासन मिलता है। अस्पतालों में संसाधनों की कमी, स्कूलों में शिक्षकों का अभाव और ग्रामीण अंचलों में खराब अधोसंरचना हकीकत बयान करती है।
सरकार जनदर्शन और समाधान शिविरों का आयोजन कर आंकड़ों का खेल जरूर खेलती है। आवेदन लेने की तस्वीरें प्रचारित होती हैं, लेकिन उन मांगों का निस्तारण कितना हुआ — इसका ठोस ब्यौरा सामने नहीं आता। कागजी कार्रवाई को उपलब्धि बताना सुशासन नहीं कहलाता। जनता को राहत चाहिए, न कि प्रेस विज्ञप्ति।
नवा रायपुर को संवारना गलत नहीं, परंतु प्रदेश के अन्य हिस्सों को उपेक्षित रखना न्यायसंगत कैसे माना जाए? विकास का अर्थ संतुलित विस्तार होता है, न कि एक ही स्थान पर संसाधनों का केंद्रीकरण। यदि राजधानी को मॉडल बनाना है तो उसी तर्ज पर हर जिले में स्वास्थ्य केंद्र, औद्योगिक इकाइयाँ, उच्च शिक्षण संस्थान और रोजगार सृजन के अवसर विकसित किए जाएँ।
बालोद और गुरूर जैसे अंचल आज भी बुनियादी सुधार की बाट जोह रहे हैं। स्थानीय नागरिकों की अपेक्षा है कि घोषणाओं के बजाय धरातल पर परिवर्तन दिखाई दे। शासन की असली कसौटी राजधानी की चमक नहीं, बल्कि गांव की मुस्कान होती है।
अब समय आ गया है कि सुशासन की परिभाषा को विस्तृत किया जाए। यदि सरकार सच में जनहित के प्रति प्रतिबद्ध है तो उसे राजधानी से बाहर निकलकर पूरे छत्तीसगढ़ की धड़कनों को सुनना होगा। अन्यथा यह सवाल लगातार गूंजता रहेगा — क्या विकास केवल नवा रायपुर का विशेषाधिकार है, या पूरे प्रदेश का अधिकार?
Indian National Congress के एक वरिष्ठ नेता ने तीखा प्रहार करते हुए कहा,
“प्रदेश की सत्ता ने सुशासन को सिर्फ विज्ञापन का शब्द बना दिया है। राजधानी की चमक दिखाकर गांवों की हकीकत छिपाई नहीं जा सकती। नवा रायपुर को सजाने में कोई आपत्ति नहीं, लेकिन जब किसान बदहाल हो, युवा बेरोजगार घूम रहा हो और ग्रामीण अस्पतालों में दवाइयां तक उपलब्ध न हों, तब करोड़ों की घोषणाएँ संवेदनहीनता का प्रमाण बन जाती हैं। सरकार बताए कि बाकी जिलों को विकास का समान अधिकार कब मिलेगा? जनता अब आंकड़ों की बाजीगरी नहीं, ठोस परिणाम चाहती है। यदि पूरे प्रदेश के साथ न्याय नहीं हुआ तो लोकतंत्र में जवाब जनता ही देगी।”



