घोषणा एक बार, संचालन किस्तों में भी नहीं! सुशासन सरकार पर सवाल

रिपोर्टर उत्तम साहू
बालोद / पलारी : छत्तीसगढ़ के बालोद जिले के विकासखंड गुरूर के 112 गावों के रहवासी मूलभूत सुविधाओं की पूर्ति लिए सरकारी विभागों में पेशी जा रहे है, जिन्हे पूर्ति करने वाले सरकारी महकमों द्वारा सिर्फ हो जाने का धारावाहिक चला रहे है। विकासखंड गुरूर बाहुल्य रूप से किसान क्षेत्र है, जो खेती किसानी कर जैसे तैसे जीवन यापन कर रहे है। शासन, प्रशासन द्वारा घोषित योजनाओं को सुनकर लाभान्वित होने जाने पर संबंधित अधिकारी नाना प्रकार के नियम, पात्र, अपात्र, योजनाओं से अयोग्य बताते है। और उसी योजनाओं से पहुंच वाले, कथित नेता रूपी लोगो के कहने पर वही अधिकारी अपात्र लोगों को पात्र बनाकर योजनाओं से लाभान्वित कर रहे है। शायद यही गारंटी, सुशासन, डबल इंजन वाली सरकार है — जहां नियम किताबों में सख्त और जमीन पर लचीले नजर आते हैं।
जिनके दिशा निर्देशन में सरकारी महकमे निभा कर आमजन, किसान, गरीब मजदूरों आदि को योजनाओं की आड़ लेकर भटका रहे है। समर्थन मूल्य के धान खरीदी में पंजीकृत किसानों के धान खरीदी में आन, आफ टोकन पद्धति से कई किसान आफ तो कई किसान अपना धान नही बेच पाये। इस पूरे खेल में बीजेपी समर्थितों को सेवा सहकारी समिति मर्या का अध्यक्ष बनाकर किया गया। नतीजा यह कि पसीना बहाने वाला किसान लाइन में खड़ा रहा और पहुंच वाले लोग व्यवस्था पर हावी रहे।
वही स्थिति झोपड़ी, जर्जर, जीर्ण शीर्ण, टूटे फूटे घर, बेघरों को पक्की छत देने प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण में किया जा रहा है। इस योजना के सही हुकदार आवेदन देकर टूटे फूटे झोपड़ी में रहकर होली तिहार मनाएंगे, तो नेतागिरी पहुंच रखने वाले के सहयोग से अपात्र नए घर में होली तिहार में खुशी का रंग उड़ाएंगे। इस पीएम आवास योजना में सही पात्र जो मूलभूत बुनियादी सुविधाओं का सही हकदार है न की अनुग्रह का — वही दर-दर की ठोकरें खा रहा है।
यह खेल अभी राशन कार्ड में चल रहा है — छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया कहते हुए मुफ्त में चावल देने मोदी की गारंटी बताकर फिर रात कढ़ी मेहनत से खून पसीने बहाकर धान उपजाने वाले किसान मुक्त चावल में अपात्र है। इनके जगह बड़े किसान, रौबदार जिनके पास सरकारी नौकरी आदि गरीबी रेखा के नीचे वाले राशनकार्ड धारी होकर मुक्त में चावल नपा रहे है। सवाल सीधा है — जो वास्तव में गरीब है, वह कागजों में अमीर कैसे हो गया? और जो प्रभावशाली है, वह गरीबी रेखा के नीचे कैसे पहुंच गया?
घोषणाएं मंचों से एक बार होती हैं, लेकिन संचालन किस्तों में भी नहीं। योजनाएं कागजों में पूरी, जमीनी हकीकत में अधूरी। किसान, मजदूर, आमजन की उम्मीदों को आश्वासन की चादर ओढ़ाकर टाल दिया जाता है। गुरूर के 112 गांवों की पीड़ा सिर्फ आंकड़ा नहीं, यह उस व्यवस्था का आईना है जहां पात्रता का निर्धारण जरूरत से नहीं, पहुंच से होता है।
सुशासन का दावा तब सार्थक होगा जब टोकन पद्धति से लेकर आवास और राशन तक हर योजना का लाभ सही हकदार तक पहुंचे। वरना यह सवाल गूंजता रहेगा — घोषणा एक बार, संचालन किस्तों में भी नहीं… आखिर जिम्मेदार कौन?



