हमर छत्तीसगढ़

सनौद पड़कीभाट स्टॉप डेम का “दिखावटी विकास” इंजीनियर और ठेकेदार आशीष तिवारी की जोड़ी पर गंभीर आरोप,!

 

रिपोर्टर:- उत्तम साहू

बालोद/पलारी:- छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में विकास कार्यों के नाम पर पारदर्शिता और गुणवत्ता को किस तरह ताक पर रखा जा रहा है, इसकी एक और चिंताजनक तस्वीर गुरूर विकासखंड के ग्राम पडकीभाट–डोटोपार मार्ग के बीच खारून नदी (डोंगाघाट) पर सामने आई है। यहां लगभग 22.30 लाख रुपये की स्वीकृत लागत से एनीकेट–स्टॉप डेम निर्माण को लेकर घटिया गुणवत्ता, नियमों की अनदेखी और जवाबदेही से बचने के गंभीर आरोप स्थानीय स्तर पर उठ रहे हैं। आरोप है कि विभागीय निरीक्षण और निर्धारित प्रक्रियाओं को दरकिनार कर एक इंजीनियर के नेतृत्व में खानापूर्ति निर्माण कराया जा रहा है—वह भी जनता के टैक्स के पैसों से।स्थानीय नागरिकों और जानकारों का कहना है कि निर्माण कार्य नागरिक सूचना बोर्ड लगाए बिना शुरू कर दिया गया, जबकि सुप्रीम कोर्ट और सरकार के स्पष्ट नियमों और सर्कुलरों के अनुसार कार्य प्रारंभ से पहले सूचना बोर्ड लगाना अनिवार्य है। सूचना बोर्ड न होने से आमजन को स्वीकृत बजट, कार्य की समय-सीमा, जिम्मेदार एजेंसी और तकनीकी विवरण जैसी बुनियादी जानकारी तक नहीं मिल पाती। सवाल उठता है—जब नियम स्पष्ट हैं, तो फिर यह गोपनीयता क्यों?
गुणवत्ता पर गंभीर सवाल और आरोप है कि एनीकेट और स्टॉप डेम निर्माण में सरिया की मात्रा को न्यूनतम रखा गया, सीमेंट कम और रेत अधिक मिलाकर कंक्रीट तैयार किया जा रहा है। स्थानीय लोगों का दावा है कि मापदंडों के विपरीत सामग्री का उपयोग कर जल्दबाजी में ढांचा खड़ा किया जा रहा है, जिससे भविष्य में संरचनात्मक मजबूती पर सीधा खतरा है। यह भी आरोप है कि ठेकेदार आशीष तिवारी ने विभागीय अधिकारियों द्वारा विधिवत निरीक्षण कराए बिना ही काम शुरू करा दिया—जो नियमों का खुला उल्लंघन है।पारदर्शिता से क्यों डर? पुल–पुलिया, एनीकेट और स्टॉप डेम जैसे कार्यों में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए दिशा-निर्देश मौजूद हैं। इसके बावजूद जमीनी हकीकत इससे उलट दिखाई दे रही है। जानकारों के अनुसार सूचना बोर्ड नहीं लगाने के पीछे भ्रष्टाचार और चोरी की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। यदि पूरी जानकारी सार्वजनिक हो, तो नागरिक निगरानी बढ़ेगी—और घटिया सामग्री, अधूरा काम व लागत में हेरफेर छिपाना मुश्किल हो जाएगा।

ठेकेदार आशीष तिवारी पर उठते सवाल

निर्माण से जुड़े ठेकेदार आशीष तिवारी को लेकर भी स्थानीय स्तर पर सवाल उठ रहे हैं। लोगों का कहना है कि पूर्व में भी उनके कार्यों को लेकर शिकायतें और विवाद सामने आते रहे हैं—जहां गुणवत्ता और नियमों के पालन पर सवाल खड़े हुए। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र जांच और आधिकारिक पुष्टि आवश्यक है, लेकिन बार-बार शिकायतों का उठना अपने आप में चिंता का विषय है। नागरिकों की मांग है कि ठेकेदार के पिछले रिकॉर्ड, पूर्ण किए गए कार्यों, भुगतान विवरण और निरीक्षण रिपोर्ट्स को सार्वजनिक किया जाए, ताकि सच्चाई सामने आ सके।इंजीनियर की भूमिका भी कटघरे में आरोप यह भी है कि विभागीय जिम्मेदारों की मौजूदगी के बजाय एक इंजीनियर द्वारा निर्माण की दिशा तय की जा रही है—वह भी मानकों की अनदेखी करते हुए। यदि यह सही है, तो यह सिर्फ तकनीकी चूक नहीं, बल्कि प्रशासनिक शिथिलता का गंभीर संकेत है। सवाल यह है कि क्या विभागीय अधिकारी निरीक्षण से बच रहे हैं, या जानबूझकर आंखें मूंदे हुए हैं?

जनता की मांग—तत्काल जांच और जवाबदेही

स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों की मांग है कि
निर्माण स्थल पर तत्काल नागरिक सूचना बोर्ड लगाया जाए,तृतीय-पक्ष गुणवत्ता जांच कराई जाए,सामग्री की लैब टेस्टिंग रिपोर्ट सार्वजनिक हो,ठेकेदार और संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए,ठेकेदार आशीष के पूर्व कार्यों का ऑडिट किया जाए।लोगों का मानना है कि यदि नियमों का सख्ती से पालन हो और जानकारी सार्वजनिक रहे, तो आधी से ज्यादा शिकायतें अपने आप समाप्त हो जाएंगी। विकास का अर्थ सिर्फ ढांचा खड़ा करना नहीं, बल्कि विश्वास और गुणवत्ता का निर्माण भी है। डोंगाघाट का यह मामला प्रशासन के लिए लिटमस टेस्ट है—या तो पारदर्शिता और गुणवत्ता के साथ कार्रवाई हो, या फिर “दिखावटी विकास” की यह कहानी और गहरी होती चली

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