“शहीद गैंदसिंह नायक की क्रांति से 2047 के विकसित भारत तक आदिवासी स्वाभिमान, संस्कृति और संघर्ष का विराट उद्घोष”

बालोद :- छत्तीसगढ़ के बालोद जिले के डौण्डी विकासखण्ड अंतर्गत ग्राम नर्राटोला उस समय इतिहास, शौर्य और जनचेतना का जीवंत मंच बन गया, जब अखिल भारतीय हल्बा–हल्बी समाज द्वारा अमर शहीद गैंदसिंह नायक के शहादत दिवस पर भव्य आयोजन किया गया। राष्ट्रीय महासभा के तत्वावधान में आयोजित इस ऐतिहासिक कार्यक्रम में जनसैलाब उमड़ पड़ा। हर चेहरा गौरव से दमक रहा था और हर स्वर में आदिवासी स्वाभिमान की गूंज सुनाई दे रही थी।कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रदेश के राजस्व, आपदा प्रबंधन एवं उच्च शिक्षा मंत्री टंक राम वर्मा ने अपने ओजस्वी उद्बोधन में कहा कि केन्द्र और राज्य सरकार आदिवासी समाज के संरक्षण, संवर्धन और सर्वांगीण विकास के लिए पूरी तरह कृतसंकल्पित है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज सहज, सरल, निष्कपट, परिश्रमी और स्वाभिमानी है, जिसकी सांस्कृतिक विरासत भारत की आत्मा है। यह समाज केवल जंगलों का नहीं, बल्कि संघर्ष, त्याग और बलिदान की परंपरा का वाहक है।मंत्री वर्मा ने अमर शहीद गैंदसिंह नायक के जीवन और संघर्ष को स्मरण करते हुए कहा कि उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत की दमनकारी नीतियों के विरुद्ध आदिवासी समाज को संगठित कर 1824–25 में क्रांति का शंखनाद किया। 1857 की क्रांति से भी पहले मध्य भारत के सघन वनों में स्वतंत्रता की जो ज्वाला प्रज्वलित हुई, उसका नेतृत्व गैंदसिंह नायक जैसे आदिवासी वीरों ने किया। 20 जनवरी 1825 को अंग्रेजों द्वारा उन्हें सरेआम फांसी दी गई, लेकिन उनका बलिदान इतिहास के पन्नों में अमर हो गया।उन्होंने कहा कि आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केन्द्र सरकार और मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ सरकार जनजातीय समाज के उत्थान को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रही है। बस्तर और अन्य आदिवासी अंचलों में शिक्षा, सड़क, पुल-पुलिया, बिजली, शुद्ध पेयजल और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं का विस्तार तेजी से हो रहा है। सरकार का लक्ष्य केवल विकास नहीं, बल्कि आदिवासी संस्कृति और परंपराओं को वैश्विक पहचान दिलाना भी है।कार्यक्रम की अध्यक्षता अखिल भारतीय हल्बा–हल्बी समाज के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व विधायक मंतूराम पवार ने की। उन्होंने समाज की ऐतिहासिक भूमिका, सांस्कृतिक गौरव और संगठन की उद्देश्यों पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि शहीदों की स्मृति केवल श्रद्धांजलि तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि सामाजिक जागरण का माध्यम बननी चाहिए।
डौण्डीलोहारा विधायक अनिला भेड़िया ने अपने संबोधन में शहीद गैंदसिंह नायक को आदिवासी चेतना का प्रतीक बताते हुए 20 जनवरी को सम्पूर्ण आदिवासी समाज के लिए शोक और संकल्प का दिन बताया। योग आयोग के अध्यक्ष रूप नारायण सिन्हा ने आदिवासी समाज की स्वाभाविक सादगी, परिश्रम और स्वाभिमान की भूरि-भूरि प्रशंसा की। केन्द्र और राज्य सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं की जानकारी देते हुए कहा कि आज आदिवासी समाज मुख्यधारा से जुड़कर आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है। दिल्ली विश्वविद्यालय के सहायक प्राध्यापक डॉ. जितेन्द्र मीणा और सामाजिक कार्यकर्ता विनोद कोसले ने संवैधानिक प्रावधानों के तहत आदिवासी अधिकारों के प्रभावी क्रियान्वयन की आवश्यकता पर बल दिया।
कार्यक्रम का स्वागत भाषण महासचिव श्याम सिंह तारम ने दिया। इस अवसर पर आंगादेव सहित आदिवासी आराध्य देवी-देवताओं का जीवंत साक्षात्कार कराते हुए सांस्कृतिक प्रस्तुति ने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक और भावनात्मक ऊर्जा से भर दिया। मंत्री टंकराम वर्मा ने सुमधुर छत्तीसगढ़ी गीत की प्रस्तुति देकर सभी को भावविभोर कर दिया।
कार्यक्रम के दौरान डॉ. कृष्णकांत राणा द्वारा रचित पुस्तक का विमोचन भी किया गया। यह आयोजन केवल एक शहादत दिवस नहीं, बल्कि आदिवासी इतिहास, संस्कृति, अधिकार और भविष्य के सपनों का सामूहिक उद्घोष बन गया—जहां शहीदों की विरासत से प्रेरणा लेकर विकसित भारत और विकसित छत्तीसगढ़ की दिशा में कदम बढ़ाने का संकल्प लिया गया।



