सुशासन के नाम पर तानाशाही! ओझागन पंचायत में सचिवशाही का बोलबाला, योजनाएं फाइलों में दफन

रिपोर्टर:- रिखी साहू
बालोद/पलारी:- छत्तीसगढ़ में सुशासन सरकार के दावों के बीच बालोद जिले के गुरूर विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत ओझागन की हकीकत इन दावों को आईना दिखा रही है। यहां पदस्थ ग्राम पंचायत सचिव हेमलाल साहू पर आरोप है कि उन्होंने शासन–प्रशासन द्वारा गांव के चहुंमुखी विकास के लिए संचालित लगभग सभी योजनाओं को ताक पर रख दिया है। पंचायत सचिव अपनी उलूक जलूल हरकत और अधिकारियों तक ऊंची पहुंच का हवाला देते हुए पूरी पंचायत व्यवस्था को बंधक बनाकर बैठे हैं, जहां न जनप्रतिनिधियों की चलती है और न ही ग्रामीणों की सुनी जाती है।ग्रामीणों का आरोप है कि सचिव द्वारा राष्ट्रीय ग्राम स्वराज अभियान, मुख्यमंत्री समग्र ग्रामीण विकास योजना, जिला पंचायत एवं जनपद पंचायत विकास निधि, पंचायत सशक्तिकरण योजना, मुख्यमंत्री आंतरिक गली विद्युतीकरण योजना, स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण), वित्त आयोग की योजनाएं, ग्राम पंचायत विकास योजना (GPDP), मनरेगा, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) सहित दर्जनों महत्वपूर्ण योजनाओं की जानकारी जानबूझकर छिपाई जा रही है।स्थिति यह है कि जब भी ग्रामीण या पंचायत प्रतिनिधि इन योजनाओं से संबंधित जानकारी, प्रस्ताव, बैठक की कार्यवाही, फाइल या बिल मांगते हैं तो सचिव का एक ही जवाब होता है— “यह योजना संचालित नहीं है” या “फाइल-बिल गुम हो गई है।”
सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि यदि ग्राम पंचायत कार्यालय से महत्वपूर्ण शासकीय योजनाओं की फाइलें और बिल वास्तव में “गुम” हो गई हैं, तो इसकी सूचना सरपंच, जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी अथवा थाने में दर्ज क्यों नहीं कराई गई? क्या यह लापरवाही है या फिर योजनाबद्ध तरीके से किए गए गड़बड़झाले को छिपाने की कोशिश?जानकारों का कहना है कि ग्राम पंचायत सचिव पंचायत प्रशासन की रीढ़ होता है, लेकिन ओझागन पंचायत में यही रीढ़ सिस्टम को पंगु बना रही है। सचिव हेमलाल साहू को ग्राम पंचायत विकास योजना (GPDP) की मूल प्रक्रिया तक की जानकारी नहीं होने का आरोप है, जबकि GPDP के तहत ग्राम सभा के माध्यम से ग्रामीणों की आवश्यकताओं का चिन्हीकरण, प्राथमिकता निर्धारण, संसाधनों का समेकन, वार्षिक व पंचवर्षीय कार्ययोजना का निर्माण और उसे भारत सरकार के प्लान-प्लस तथा एक्शन-सॉफ्ट पोर्टल पर दर्ज करना अनिवार्य है।योजनाओं के क्रियान्वयन में पारदर्शिता, सामाजिक उत्तरदायित्व, अनुसूचित जाति–जनजाति एवं वंचित वर्गों को प्राथमिकता, पर्यावरणीय विश्लेषण और मांग आधारित नियोजन जैसी बुनियादी बातों को पूरी तरह नजरअंदाज किया जा रहा है। न ग्राम सभाएं समय पर हो रही हैं, न निर्णयों में समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित की जा रही है।ग्रामीणों का कहना है कि सचिव स्वयं के विकास में पूरी तरह सक्रिय हैं, लेकिन गांव का विकास ठप पड़ा है। सड़कों, नालियों, रोजगार, आवास और स्वच्छता जैसे बुनियादी मुद्दों पर पंचायत शून्य नजर आ रही है।अब सवाल यह है कि क्या जिला प्रशासन और पंचायत विभाग इस कथित सचिवशाही पर लगाम लगाएगा या फिर सुशासन का नारा ओझागन पंचायत में केवल कागजों तक ही सीमित रह जाएगा? यदि समय रहते जांच और कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मामला पूरे पंचायत तंत्र की विश्वसनीयता पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर देगा।



