हमर छत्तीसगढ़

डोटोपार में कानून की धज्जियाँ उड़ाता अवैध ईंट भट्ठा पर्यावरण, श्रम और राजस्व पर खुला हमला

संवाददाता:- उत्तम साहू

बालोद/पलारी— छत्तीसगढ़ के बालोद जिले के गुरूर विकासखंड अंतर्गत ग्राम डोटोपार में अवैध ईंट भट्ठे का संचालन प्रशासनिक उदासीनता और नियमों की खुली अवहेलना का ज्वलंत उदाहरण बन गया है।शासन प्रशासन के नाक के नीचे दुर्गेशी राम द्वारा बिना रोकटोक के अवैध रूप से ईंट भट्टा का संचालन करने से क्षेत्र में पर्यावरण का सेहत बिगाड़ रहा हैं।बिना किसी वैधानिक अनुमति के चल रहा यह ईंट भट्ठा न केवल पर्यावरणीय संतुलन को तहस-नहस कर रहा है, बल्कि श्रम कानूनों, खनन नियमों और राजस्व व्यवस्था पर भी सीधा प्रहार है। क्षेत्र की आबोहवा जहरीली होती जा रही है और ग्रामीणों का जीवन दूभर हो चुका है।भट्ठे की चिमनी से निकलता घना धुआँ हवा में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड जैसे हानिकारक तत्वों का जाल बुन रहा है। सांस संबंधी बीमारियाँ बढ़ रही हैं, आंखों में जलन, त्वचा रोग और दमा जैसी समस्याएँ आम हो गई हैं। राख और धूल खेतों पर जमकर फसलों को नुकसान पहुँचा रही है, जिससे किसान खेती-किसानी से कटने को मजबूर हैं। मृदा क्षरण और जलवायु पर पड़ता प्रतिकूल प्रभाव आने वाली पीढ़ियों के लिए गंभीर संकट का संकेत है।सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि ईंट निर्माण के लिए खनिज विभाग की अनुमति तक नहीं ली गई। शासकीय व निजी जमीन से अवैध खनन कर मिट्टी निकाली जा रही है, जिससे राजस्व को भारी क्षति हो रही है। चोरी की बिजली और अनधिकृत जल उपयोग के जरिए नियमों को रौंदते हुए उत्पादन किया जा रहा है। यह न केवल आर्थिक अपराध है, बल्कि सार्वजनिक संसाधनों की खुली लूट भी है।श्रम कानूनों का उल्लंघन भी उतना ही भयावह है। दूर-दराज से मजदूर लाकर काम कराया जा रहा है, जिनकी कोई आधिकारिक सूचना न तो प्रशासन को दी गई और न ही पुलिस को। न पंजीकरण, न सुरक्षा मानक, न स्वास्थ्य सुविधा—यह श्रमिक शोषण का नग्न रूप है। रिकॉर्डेड बातचीत से यह भी उजागर हुआ है कि संचालन के लिए आवश्यक अनुमतियाँ जानबूझकर नहीं ली गईं, यानी नियमों की अनदेखी नहीं, बल्कि साजिशन अवहेलना की जा रही है।वन संपदा पर हमला अलग स्तर पर जारी है। ईंट पकाने के लिए हरे-भरे पेड़ों की अवैध कटाई की शिकायतें सामने आई हैं। सागौन, महुआ, जाम, साजा जैसे बहुमूल्य वृक्षों को ईंधन बनाकर प्रकृति की रीढ़ तोड़ी जा रही है। यह अपराध सिर्फ पर्यावरण का नहीं, बल्कि जैव विविधता और ग्रामीण आजीविका का भी है।सबसे गंभीर पहलू यह है कि संचालक के बयान प्रशासनिक सख्ती को चुनौती देते प्रतीत होते हैं। यदि यह दावा सही है कि शिकायतों के बावजूद कार्रवाई नहीं होगी, तो यह कानून के राज पर सीधा प्रश्नचिह्न है। नियमों का भय समाप्त होना अराजकता को जन्म देता है।अब समय है कि जिला प्रशासन, खनिज, प्रदूषण नियंत्रण, पर्यावरण और श्रम विभाग संयुक्त रूप से त्वरित और कठोर कार्रवाई करें। अवैध भट्ठे को तत्काल सील किया जाए, दोषियों पर आपराधिक प्रकरण दर्ज हों, पर्यावरणीय क्षति का आकलन कर क्षतिपूर्ति वसूली जाए और शोषित मजदूरों को संरक्षण मिले। कानून का सम्मान तभी बचेगा, जब कानून तोड़ने वालों को उदाहरणात्मक दंड मिलेगा।

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