बेलौदी के किसान टोकन को तरसते धान के ढेर से पैदा हुआ कर्ज किसानों पर टूटा प्रशासनिक कहर

संवाददाता :- उत्तम साहू
बालोद/पलारी :- छत्तीसगढ़ की धान की खुशबू जिन खेतों से उठती है, आज उन्हीं खेतों के मालिक बेलौदी धान उपार्जन केन्द्र में अपमान और पीड़ा का घूंट पीने को मजबूर हैं। जिले के पहले धान उपार्जन केन्द्र बेलौदी में सेवा सहकारी समिति मर्यादित के अंतर्गत पंजीकृत किसानों के साथ जो हो रहा है, वह न केवल अमानवीय है बल्कि शासन के किसान हितैषी दावों पर करारा तमाचा भी है।16 नवंबर 2025 से शुरू हुई धान खरीदी के बावजूद आज तक 21 किसानों का धान नहीं खरीदा गया, जिनमें से छह किसानों का तो एक बार भी टोकन तक नहीं कटा। शाखा प्रबंधक बसंत कुमार साहू कलेक्टर के आदेश का हवाला देकर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते नजर आ रहे हैं, जबकि किसान खुले आसमान के नीचे अपनी फसल की रखवाली करने को विवश हैं।जिन किसानों की मेहनत को कागज़ी आदेशों में कुचला गया है, उनमें ग्राम चिचबोड़ के किसान खेलन आ. डोमार (52 क्विंटल 80 किलो), खुमन आ. डोमार (52 क्विंटल 40 किलो), ललिता पति देवलु (10 क्विंटल 80 किलो), दिनेश कुमार आ. सोधुराम (24 क्विंटल 80 किलो), ग्राम बेलौदी के ग्वाल गिरीश आ. बंशीलाल (40 क्विंटल 40 किलो), ग्राम भुसरेंगा की सुखयारिन आ. बल्देव (20 क्विंटल 80 किलो) और गीता बाई आ. रामाधीन शामिल हैं, जिनका आज तक एक भी टोकन नहीं कटा। इन किसानों पर हजारों रुपये का कर्ज है, फिर भी उनकी सुनवाई शून्य है।इसी तरह अन्य पीड़ित किसानों में चिचबोड़ की उतरा बाई आ. मोतीराम (29 क्विंटल 80 किलो), बेलौदी की उतरा बाई आ. मोतीराम (17 क्विंटल 80 किलो), त्रिलोकचंद आ. हीरूराम बेलौदी (11 क्विंटल 20 किलो), चिचबोड़ के हरिनारायण आ. कंवल सिंह (31 क्विंटल 80 किलो), भुजबल आ. बिसम्बर (42 क्विंटल 40 किलो), भुसरेंगा के नेमसिंह आ. झाडूराम (22 क्विंटल 80 किलो), बेलौदी के भगोली आ. सुखलाल (30 क्विंटल 80 किलो), चिचबोड़ के सोहन आ. पल्टन (10 क्विंटल 80 किलो), कामता प्रसाद आ. जगदीश (27 क्विंटल 60 किलो), बेलौदी की बीन्दा बाई आ. थानसिंह (8 क्विंटल 80 किलो), हेमप्रकाश आ. टोपीलाल बेलोदी (29 क्विंटल 40 किलो), मोरध्वज आ. गंभीर चिचबोड़ (10 क्विंटल), दुबीन आ. मगन चिचबोड़ (64 क्विंटल), उदयराम आ. मुरलीधीर बेलौदी (45 क्विंटल) और तेजप्रताप नारायण आ. चोवाराम चिचबोड़ (63 क्विंटल 30 किलो) शामिल हैं। कुल मिलाकर 634 क्विंटल से अधिक धान आज भी उपार्जन केन्द्र में पड़ा सड़ने की कगार पर है।यह केवल धान की खरीदी नहीं, बल्कि किसान के आत्मसम्मान की खरीदी का सवाल है। कलेक्टर का आदेश यदि इतना ही अटल है तो उसका मानवीय समाधान क्यों नहीं? प्रशासन की यह निष्ठुरता किसानों को यह सोचने पर मजबूर कर रही है कि क्या उनकी मेहनत सिर्फ आंकड़ों तक सीमित है। बेलौदी के किसान आज न्याय की नहीं, सिर्फ अपने हक की गुहार लगा रहे हैं—लेकिन सवाल यह है कि क्या सत्ता के गलियारों तक उनकी चीख पहुंचेगी, या फिर यह धान भी उनके सब्र की तरह यूं ही बिखर जाएगा?



