नगर पंचायत पलारी फिर उसी अंधेरे की ओर सुबह की पहली रोशनी में नशे का कारोबार

संवाददाता:- रवि कोसरे
बालोद/पलारीः— छत्तीसगढ़ के बालोद जिले की नगर पंचायत पलारी एक बार फिर अवैध शराब कारोबार की गिरफ्त में फंसती नजर आ रही है। शासन के स्पष्ट नियमों के अनुसार सरकारी शराब दुकान सुबह दस बजे खुलती है, लेकिन पलारी में नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए दिन निकलते ही अवैध शराब की बिक्री खुलेआम शुरू हो जाती है। यह धंधा अब केवल गली-मोहल्लों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि मोबाइल कॉल के जरिए “घर पहुंच सेवा” के रूप में संचालित किया जा रहा है, जो प्रशासनिक तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े करता है।नगरवासियों के अनुसार, बीते वर्षों में पलारी अवैध शराब के कारण बदनाम हो चुका था। सुबह होते ही नशेड़ियों की भीड़, गलियों में हंगामा, रास्तों पर लड़खड़ाते लोग—यह सब यहां की पहचान बन गई थी। सबसे ज्यादा परेशानी महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों को झेलनी पड़ती थी। घरों के भीतर कलह, सड़कों पर विवाद और आए दिन होने वाली झड़पों ने पूरे नगर का सामाजिक संतुलन बिगाड़ दिया था।अवैध शराब की लत ने ग्रामीणों की आर्थिक कमर भी तोड़ दी। खेतों की दवा, बच्चों की स्कूल फीस, घरेलू जरूरतों और जरूरी कार्यों के लिए रखा गया पैसा नशे की भट्टी में झोंक दिया जाता था। परिणामस्वरूप परिवार बिखरते गए, जिम्मेदारियां टूटती चली गईं और गांव का माहौल लगातार जहरीला होता गया। नशे में धुत लोग कामकाज छोड़ झगड़े और मारपीट में उलझे रहते थे, जिससे पूरे क्षेत्र में भय और असुरक्षा का वातावरण बन गया था।इस अराजकता के खिलाफ पलारी के प्रबुद्ध नागरिकों, गणमान्य व्यक्तियों, पीड़ित ग्रामीणों तथा माता-बहनों ने एकजुट होकर आवाज उठाई। सामाजिक दबाव और सामूहिक प्रयासों के चलते करीब चार-पांच वर्षों तक हालात संभले रहे और नगर में शांति का माहौल लौटा। यह एक मिसाल थी कि जब समाज जागता है तो अव्यवस्था को पीछे धकेला जा सकता है।लेकिन अब ग्रामीण सूत्रों से मिली जानकारी ने फिर चिंता बढ़ा दी है। बताया जा रहा है कि पलारी निवासी यशकुमार द्वारा दोबारा अवैध शराब का कारोबार शुरू कर दिया गया है। यदि यह सिलसिला यूं ही चलता रहा, तो देखादेखी अन्य लोग भी इस गैरकानूनी धंधे में कूद पड़ेंगे। नतीजा वही पुराना—अशांति, विवाद और सामाजिक पतन।यह केवल कानून व्यवस्था का सवाल नहीं, बल्कि पूरे समाज के भविष्य का मुद्दा है। अवैध शराब सिर्फ नशा नहीं बेचती, यह घरों की खुशियां, बच्चों का भविष्य और गांव की शांति छीन लेती है। अब जरूरत है कि प्रशासन त्वरित और कठोर कार्रवाई करे, ताकि पलारी एक बार फिर उसी अंधेरे में न धकेली जाए, जहां से निकलने में वर्षों लगे थे। समाज ने पहले भी लड़ाई लड़ी थी, अब फिर से सजग होने का समय है—क्योंकि खामोशी ही इस अवैध कारोबार की सबसे बड़ी ताकत है।



