बालोद में शिक्षा पर ताला, डौंडीलोहारा ब्लॉक निशाने पर — संरक्षण, पक्षपात और मनुवादी एजेंडे के गंभीर आरोप

बालोद:- छत्तीसगढ़ के बालोद जिला में सूत्रों से पता चला है कि डौंडीलोहारा से मानपुर होते हुए महाराष्ट्र जाने वाले नेशनल हाईवे पर बसा ग्राम माटरी के माध्यमिक शाला स्कूल में पालक और गांव वालों के द्वारा ताला जड़ दिया गया है। कारण जो भी हो, परंतु शिक्षा के लिए इस समय ताला बंद होना अनुचित है। पिछले 2 दिन से ग्रामीण धरना प्रदर्शन कर रहे हैं, लेकिन शिक्षा विभाग की संवेदनहीनता जस की तस बनी हुई है। परीक्षा सिर पर है और ऐसे समय में स्कूल पर ताला लगना सीधे-सीधे बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ है।जिले में पांच ब्लॉक हैं। अन्य ब्लॉक में ताला बंदी नहीं होती है, लेकिन सिर्फ डौंडीलोहारा ब्लॉक के शिक्षा विभाग के स्कूलों में ही ताला बंद हो रहा है। यह कोई संयोग नहीं, बल्कि एक गंभीर प्रशासनिक विफलता और संदिग्ध कार्यप्रणाली की ओर इशारा करता है। सवाल यह है कि जब पूरे जिले में हालात सामान्य हैं, तो केवल डौंडीलोहारा ब्लॉक में ही बार-बार शिक्षा व्यवस्था क्यों चरमराती नजर आ रही है।इसके बावजूद ब्लॉक शिक्षा अधिकारी हिमांशु मिश्रा को लगातार बचाया जाता है। आम लोगों का कहना है कि “मिश्रा मिश्रा भाई-भाई” होने की वजह से एक वाद हावी हो रहा है। जिले के सबसे बड़े अधिकारी, जिनके हाथ में जिले का कामन है, वही उन्हें बचा रही हैं। यह संरक्षण अब छिपा हुआ नहीं रहा, बल्कि खुलेआम दिख रहा है। आम जनता सब समझ रही है और यही सवाल पूछ रही है कि आखिर कब तक बचाया जाएगा।लोगों का कहना है कि आरक्षण की बातें तो बड़े जोर-शोर से की जाती हैं, लेकिन असली संरक्षण ऐसे ही देखने को मिलता है। अपने जाति भाई को बचाकर आरक्षण संरक्षण दो—यही व्यवहारिक सच्चाई बनती जा रही है। यह न केवल सामाजिक न्याय की अवधारणा का मजाक है, बल्कि व्यवस्था पर भरोसे को भी गहरी चोट पहुंचाता है।इस वक्त, जब परीक्षा सर पर है, और इस तरह की घटना सामने आती है, तो इसकी पूरी जिम्मेदारी केवल और केवल हिमांशु मिश्रा और उसके सहायक असिस्टेंट एबीओ पर आती है। प्रशासनिक लापरवाही, संवादहीनता और जमीनी सच्चाई से कटाव ने बच्चों को पढ़ाई से वंचित कर दिया है। यह स्थिति किसी भी जिम्मेदार सरकार के लिए शर्मनाक होनी चाहिए।ग्रामीणों के बीच यह चर्चा भी तेज है कि शायद सरकार ने इन्हीं को आदेश दिया है कि आदिवासी अंचल के बच्चों को कमजोर कर पढ़ाई से वंचित रखें। इसी एजेंडा में काम करते हुए मनुवादी सोच को थोपने का आरोप लगाया जा रहा है। शिक्षा, जो सशक्तिकरण का सबसे मजबूत हथियार है, उसी पर ताला लगाकर आदिवासी बच्चों के भविष्य को अंधेरे में धकेला जा रहा है।यह केवल एक स्कूल या एक ब्लॉक का मामला नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम पर सवाल है। शिक्षा के मंदिर पर ताला, प्रशासन की चुप्पी, अधिकारियों को मिला संरक्षण और आदिवासी अंचल के बच्चों के साथ होता अन्याय—यह सब मिलकर एक खतरनाक तस्वीर पेश करता है। अगर समय रहते जवाबदेही तय नहीं हुई, तो यह ताला केवल स्कूल पर नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों पर लग जाएगा।



