किसानों की धान पर ताला टोकन बंद सत्यापन के नाम पर अपमान—अब आम आदमी पार्टी करेगी आर-पार की लड़ाई

बालोद:- छत्तीसगढ़ के बालोद जिला में आम आदमी पार्टी चेतावनी नहीं, ऐलान कर रही है—किसान अपमान बर्दाश्त नहीं करेगा। इसी कड़ी में 29 जनवरी 2026 को किसानों के साथ मिलकर बालोद जिले के झलमला में धरना-प्रदर्शन किया । यह प्रदर्शन केवल मांगों का नहीं, किसान के स्वाभिमान का सवाल है। खेत-खलिहान की आवाज अब सड़कों पर गूंजेगी।आम आदमी पार्टी की स्पष्ट और गैर-परक्राम्य मांगें हैं।पहली, टोकन काटने की प्रक्रिया तत्काल सुचारु की जाए और किसी भी किसान को सत्यापन के नाम पर प्रताड़ित न किया जाए।दूसरी, एग्रीस्टेक की खामियों का खामियाजा किसानों से वसूलना बंद किया जाए; काटे गए रकबे बहाल हों।तीसरी, प्रतिदिन की लिमिट हटाई जाए ताकि हर किसान अपनी पूरी उपज बेच सके।चौथी और सबसे अहम—धान खरीदी की अंतिम तिथि 28 फरवरी 2026 तक बढ़ाई जाए, ताकि किसान अपनी मेहनत का एक-एक दाना बेच सके।सरकार यदि आज भी बहाने बनाएगी, तो कल आंदोलन का दायरा बढ़ेगा। आम आदमी पार्टी किसानों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी है। यह लड़ाई किसी दल की नहीं, अन्नदाता के सम्मान की है।प्रदेश की धरती पर अन्न उगाने वाला किसान आज खुद भूख, कर्ज और अपमान के बीच दम तोड़ने को मजबूर है। आम आदमी पार्टी यह साफ शब्दों में कहती है कि छत्तीसगढ़ की मौजूदा व्यवस्था किसानों के साथ अन्याय नहीं, बल्कि सुनियोजित अत्याचार कर रही है। धान खरीदी के नाम पर किसानों को लाइन में खड़ा करना, टोकन न काटना, भौतिक सत्यापन के बहाने बेइज्जत करना—यह सब शासन की नाकामी नहीं, उसकी बेरुखी का सबूत है।एग्रीस्टेक के नाम पर हुई मडबड़ी और सर्वर डाउन की मार ने लाखों किसानों का रकबा काट दिया। गलती सिस्टम की, सजा किसान को—यह कौन सा न्याय है? इससे भी आगे बढ़कर, किसानों पर जबरन रकबा समर्पण का दबाव बनाया जा रहा है। जिन खेतों में पसीना बहाकर फसल खड़ी की, उसी फसल को बेचने से रोका जा रहा है। प्रतिदिन की मनमानी लिमिट ने हालात और बदतर कर दिए हैं—कई किसान आधी फसल बेचकर लौटने को मजबूर हैं, शेष उपज गोदामों के बाहर सड़ रही है।कर्ज लेकर खेती करने वाला किसान जब अपनी उपज नहीं बेच पाता, तो उसकी रातें बेचैनी में कटती हैं। बैंक की किस्तें, साहूकार का दबाव, परिवार की जिम्मेदारी—इन सबके बीच सरकार की चुप्पी आग में घी का काम कर रही है। नतीजा भयावह है: प्रदेश में कई किसान आत्महत्या का प्रयास कर चुके हैं। यह कोई आकस्मिक घटना नहीं, यह उस नीति का परिणाम है जो फाइलों में चमकती है और खेतों में खून-पसीना चूसती है। अगर समय रहते धान नहीं बिकी, तो यह संकट और गहराएगा—और इसके लिए पूरी जिम्मेदारी सरकार की होगी।अगर सरकार ने किसानों की आवाज नहीं सुनी, तो यह आंदोलन गांव-गांव, तहसील-तहसील तक फैलेगा। किसान झुकेगा नहीं—अब फैसला सरकार के हाथ में है: समाधान या संघर्ष।



