हमर छत्तीसगढ़

नारागांव में काग़ज़ी विकास का घोटाला — पाँच लाख की योजना बनी ही नहीं, पूरी राशि आहरित, कलेक्टर तक जवाबदेही तय हो

 

बालोद:- छत्तीसगढ़ के जिला बालोद अंतर्गत ग्राम पंचायत नारागांव में विकास के नाम पर जो तस्वीर सामने आई है, वह न केवल चौंकाने वाली है बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े करती है। पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग की विधायक निधि योजना, स्वीकृत वर्ष 2025–26, सूचना पट्ट पर दर्ज विवरण के अनुसार पाँच लाख रुपये की तकनीकी एवं प्रशासकीय स्वीकृति के साथ स्वीकृत की गई थी। परंतु हकीकत यह है कि योजना आज तक बनी ही नहीं, और इससे भी अधिक गंभीर तथ्य यह कि पूरी राशि का आहरण हो चुका है।जहाँ कार्य होना था, वहाँ न निर्माण है, न सामग्री, न मजदूरों की मौजूदगी। केवल दीवार पर टंगा सूचना पट्ट इस बात का गवाह है कि काग़ज़ों में विकास पूरा दिखा दिया गया, जबकि ज़मीन पर शून्य पसरा है। यह स्थिति साधारण लापरवाही नहीं, बल्कि सुनियोजित वित्तीय अनियमितता की ओर स्पष्ट इशारा करती है।सूचना पट्ट पर ग्राम पंचायत नारागांव, कार्य एजेंसी, उप अभियंता, अनुविभागीय अधिकारी और कार्य प्रारंभ तिथि तक दर्ज है। इसके बावजूद कार्य का एक प्रतिशत भी निष्पादन न होना यह दर्शाता है कि जिम्मेदारी तय करने की बजाय सभी ने आंखें मूंद रखी हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब काम हुआ ही नहीं, तो पाँच लाख रुपये किस आधार पर आहरित किए गए? भुगतान किसने स्वीकृत किया, और किस सत्यापन के आधार पर राशि निकाली गई—यह सीधा-सीधा घोटाले का संकेत है।इस पूरे मामले में केवल पंचायत या निचले अमले को दोषी ठहराना पर्याप्त नहीं है। जिला कलेक्टर, बालोद की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। जिले में संचालित योजनाओं की निगरानी, सत्यापन और वित्तीय अनुशासन सुनिश्चित करना कलेक्टर का दायित्व है। बिना निर्माण के पूरी राशि निकल जाना यह सिद्ध करता है कि या तो निगरानी तंत्र पूरी तरह विफल है, या फिर जानबूझकर अनदेखी की गई। दोनों ही स्थितियों में कलेक्टर की जवाबदेही तय होनी चाहिए।ग्रामीण विकास योजनाएँ जनता की बुनियादी जरूरतों से जुड़ी होती हैं। नारागांव के ग्रामीण आज भी उस सुविधा से वंचित हैं, जिसके लिए पैसा स्वीकृत हुआ था। यह केवल धन की हानि नहीं, बल्कि जनता के अधिकारों की लूट है। काग़ज़ों में पूर्ण दिखाकर राशि हड़प लेना लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सीधा हमला है।अब समय चेतावनी का नहीं, कठोर कार्यवाही का है। तत्काल प्रभाव से उच्चस्तरीय जांच बैठाई जाए। ग्राम पंचायत नारागांव से लेकर जिला स्तर तक सभी संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच हो। बिना कार्य के आहरित पूरी राशि की वसूली की जाए। दोषी पाए जाने पर प्राथमिकी दर्ज कर आपराधिक कार्यवाही शुरू हो। साथ ही, निगरानी में चूक के लिए जिला कलेक्टर से भी जवाब तलब किया जाए।यदि ऐसे मामलों पर सख्ती नहीं हुई, तो विकास योजनाएँ केवल दीवारों पर लिखे आंकड़ों तक सिमटकर रह जाएँगी। नारागांव का यह मामला उदाहरण बनना चाहिए—ताकि भविष्य में कोई भी योजना काग़ज़ों में पूरी दिखाकर जनता को ठगने का साहस न करे। अब जवाब चाहिए, कार्रवाई चाहिए।

सूत्रों से यह भी जानकारी सामने आ रही है कि इस कथित काग़ज़ी विकास घोटाले में विधायक के खास माने जाने वाले ठेकेदार सुमित राजा राजपूत की भूमिका संदिग्ध बताई जा रही है। बताया जा रहा है कि योजना से संबंधित कार्य एजेंसी और भुगतान प्रक्रिया में ठेकेदार सुमित राजा राजपूत का प्रभाव रहा है। यदि यह तथ्य सही है, तो मामला केवल प्रशासनिक लापरवाही तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि राजनीतिक संरक्षण में किए गए वित्तीय घोटाले की आशंका को और मजबूत करता है। ऐसे में जांच को निष्पक्ष और प्रभावी बनाने के लिए ठेकेदार सुमित राजा राजपूत की भूमिका, संपर्कों और भुगतान से जुड़े सभी दस्तावेज़ों की गहन जांच अनिवार्य हो जाती है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि बिना निर्माण के राशि आहरण में किस-किस ने लाभ उठाया और किसके संरक्षण में यह पूरा खेल खेला गया।

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