बालोद/दल्ली राजहरा :—छत्तीसगढ़ में बालोद जिला के नगर पालिका दल्ली राजहरा में जिस गांधी चौक का नाम सत्य, अहिंसा और नैतिकता का प्रतीक है, आज उसी चौक को सट्टा-जुए के अड्डे में तब्दील कर दिया गया है। दल्ली राजहरा में नए थाना प्रभारी की तैनाती के बाद आम जनता को कानून-व्यवस्था के सख्त होने की उम्मीद थी, लेकिन ज़मीनी हकीकत ने उन उम्मीदों पर करारा तमाचा जड़ दिया। अपराध कम होने के बजाय और अधिक संगठित, निर्भीक और संरक्षित होकर सामने आया है।नगर का हृदय कहे जाने वाले गांधी चौक पर दिनदहाड़े पान ठेले की आड़ में अवैध अंकों का खेल बेरोकटोक चल रहा है। सुबह से लेकर देर रात तक संदिग्ध लोगों की आवाजाही, इशारों में सौदे, मोबाइल पर नंबरों की लेन-देन—सब कुछ खुलेआम। हैरानी यह नहीं कि यह सब हो रहा है, हैरानी यह है कि यह सब होने दिया जा रहा है।सबसे शर्मनाक और चिंताजनक दृश्य तब सामने आता है जब इस अवैध भीड़ में नाबालिग बच्चे भी शामिल दिखते हैं। अपराध की पाठशाला में उन्हें समय से पहले दाखिला दिलाया जा रहा है। यह केवल कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी के भविष्य पर सीधा हमला है। सवाल उठता है—क्या पुलिस को यह दिखाई नहीं देता, या फिर दिखाई देकर भी अनदेखा किया जा रहा है?स्थानीय महिलाओं और वार्डवासियों का आक्रोश अब गुस्से में बदल चुका है। महिलाओं का कहना है कि चौक से गुजरना असुरक्षित हो गया है। असामाजिक तत्वों की भीड़, फब्तियां, डर और असहजता—यह सब उनकी रोजमर्रा की मजबूरी बन गई है। कई बार शिकायतें की गईं, लेकिन नतीजा शून्य। इससे पुलिस की नीयत पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।स्थानीय लोगों का आरोप है कि सट्टा संचालन किसी छोटे-मोटे खिलाड़ी का नहीं, बल्कि एक संगठित नेटवर्क का हिस्सा है, जिसे पुलिस संरक्षण हासिल है। यही कारण है कि जब भी कोई कार्रवाई होती है, तो मुख्य संचालक तक हाथ नहीं पहुंचता। हर बार कोई मोहरा, कोई छोटा खिलाड़ी पकड़कर खानापूर्ति कर ली जाती है। बड़ी मछली हमेशा जाल से बाहर ही रहती है।सूत्र बताते हैं कि सट्टा नेटवर्क डर, धमकी और रसूख के बल पर चलाया जा रहा है। जिन लोगों को आवाज उठानी चाहिए, वे खामोश हैं, और जिन पर कार्रवाई की जिम्मेदारी है, वे या तो मजबूर हैं या मिलीभगत में शामिल। यह स्थिति कानून के राज को खोखला कर रही है।सबसे बड़ा सवाल गांधी चौक की गरिमा का है। महात्मा गांधी के नाम से जुड़ा यह चौक आज अवैध धंधों का प्रतीक बनता जा रहा है। यह केवल एक चौक की बदनामी नहीं, बल्कि समाज की नैतिक हार है। क्या प्रशासन को इस कलंक की कोई चिंता नहीं?अब जनता का सब्र जवाब दे रहा है। सवाल सीधा है—क्या पुलिस कभी असली गुनहगार तक पहुंचेगी, या फिर दिखावटी कार्रवाइयों से खुद को पाक-साफ साबित करती रहेगी? गांधी चौक के लोग अब नाटक नहीं, निर्णायक कार्रवाई चाहते हैं। अगर अब भी सट्टा-जुए की जड़ पर वार नहीं हुआ, तो यह साफ माना जाएगा कि अपराध नहीं, बल्कि कानून ही घुटनों पर आ गया है।
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