मंदिर स्थापना पर निकली भव्य कलश-शोभायात्रा, श्रद्धा और शक्ति का बना जनसैलाब

रिपोर्ट:- गोपाल निर्मलकर
दुर्ग:- छत्तीसगढ़ में दुर्ग जिले के पद्मनाभपुर में मंदिर स्थापना के पावन अवसर पर निकली भव्य शोभायात्रा ने पूरे क्षेत्र को आध्यात्मिक ऊर्जा, उत्साह और सांस्कृतिक गौरव से सराबोर कर दिया। यह आयोजन केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि सामाजिक एकजुटता और लोकआस्था का विराट प्रदर्शन बनकर सामने आया।सुबह से ही वातावरण में शंखध्वनि, घंटों की गूंज और भक्ति गीतों की स्वर लहरियाँ गूंजने लगी थीं। कलश यात्रा ईडब्ल्यूएस कॉलोनी स्थित पानी टंकी से प्रारंभ होकर पद्मनाभपुर मार्ग से होती हुई एलआईजी हाउसिंग बोर्ड के रास्ते पुनः मंदिर परिसर पहुंचकर संपन्न हुई। यात्रा के मार्ग में जगह-जगह श्रद्धालुओं ने पुष्प वर्षा कर स्वागत किया, जिससे पूरा रास्ता मानो भक्तिभाव की पुष्पमालाओं से सजा दिखाई दिया।इस शोभायात्रा की सबसे बड़ी विशेषता रही महिलाओं की अद्भुत भागीदारी। क्षेत्र की 500 से अधिक महिलाओं ने सिर पर कलश धारण कर अनुशासित पंक्तियों में चलते हुए श्रद्धा, शक्ति और संस्कृति की अनुपम छवि प्रस्तुत की। रंग-बिरंगी पारंपरिक वेशभूषा, मंगल गीतों की स्वरधारा और सामूहिक उत्साह ने पूरे आयोजन को जीवंत और दिव्य बना दिया। यह दृश्य केवल धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक समरसता का प्रतीक बनकर उभरा।यात्रा में शामिल श्रद्धालुओं के चेहरों पर आस्था की चमक साफ झलक रही थी। युवा ढोल-नगाड़ों की थाप पर चल रहे थे, बुजुर्ग आशीर्वाद दे रहे थे और बच्चे भी इस आध्यात्मिक वातावरण में उत्साह से भरे दिखाई दिए। रास्ते भर “जय माता दी” और “हर हर महादेव” के जयघोषों ने माहौल को ऊर्जावान बनाए रखा।मंदिर पहुंचने पर वैदिक मंत्रोच्चार के साथ कलश स्थापना और पूजन संपन्न हुआ। पंडितों द्वारा विधिवत अनुष्ठान कराया गया, जिसके बाद प्रसाद वितरण किया गया। आयोजन समिति ने बताया कि यह मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक गतिविधियों का केंद्र बनेगा, जहां समय-समय पर सेवा कार्य और धार्मिक आयोजन किए जाएंगे।स्थानीय नागरिकों का कहना है कि इस प्रकार के आयोजन समाज को जोड़ते हैं, संस्कारों को मजबूत करते हैं और नई पीढ़ी को परंपरा से परिचित कराते हैं। पूरे कार्यक्रम में अनुशासन, सहयोग और सामूहिक भावना स्पष्ट रूप से दिखाई दी।यह भव्य शोभायात्रा साबित करती है कि जब आस्था, संस्कृति और समाज एक साथ खड़े होते हैं, तो आयोजन केवल कार्यक्रम नहीं रहता — वह इतिहास बन जाता है।



