हमर छत्तीसगढ़

मृत प्रशिक्षण अधिकारी की फाइल 18 महीने से अटकी, विभाग पर उठे सवाल भटकता परिवार, संवेदनहीन व्यवस्था बेनकाब

 

रिर्पोट:- गोपाल निर्मलकर

दुर्ग/भिलाई:- छत्तीसगढ़ में सरकारी तंत्र की सुस्ती और असंवेदनशीलता का एक बेहद गंभीर मामला सामने आया है। आदर्श शासकीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्था भिलाई में फिटर पद पर कार्यरत रही दिवंगत प्रशिक्षण अधिकारी उपासना अग्रवाल की एक हादसे में मृत्यु हो गई थी उनके परिवार को पेंशन नहीं मिल सकी है। जबकि आवेदक द्वारा सभी आवश्यक कागजात जमा कराए जा चुके हैं फिर भी परिवार लगातार दफ्तरों के चक्कर काट रहा है, मगर हर बार उन्हें केवल बहाने, टालमटोल और जिम्मेदारी से बचने की कोशिश ही मिलती है। कोई कहता है परीक्षा अवधि चल रही है, कोई कहता है फाइल आई ही नहीं, कोई कहता है मेल देखने का समय नहीं मिला। सवाल यह है कि क्या एक मृत कर्मचारी के परिवार की फाइल इतनी महत्वहीन है कि उसे महीनों तक देखा ही न जाए।पीड़ित परिवार का कहना है कि वे डेढ़ साल से दर-दर भटक रहे हैं। बार-बार आवेदन दिए, अधिकारियों से मिले, लेकिन हर जगह उन्हें निराशा ही मिली। उनका दर्द साफ झलकता है जब वे कहते हैं कि हमें हमारा हक चाहिए, किसी पर एहसान नहीं। उन्हें लगता है कि बिना चढ़ावा दिए सरकारी मशीनरी चलती ही नहीं और उनकी मजबूरी को नजरअंदाज किया जा रहा है।संस्था के प्राचार्य का कहना है कि मामला नियुक्तिकर्ता स्तर पर अटका हुआ है और वे इसमें कुछ नहीं कर सकते। दूसरी ओर नियुक्तिकर्ता विभाग यह कहकर जिम्मेदारी से बच रहा है कि उनके पास प्रकरण की हार्ड कॉपी आई ही नहीं और मेल देखने का भी समय नहीं मिला। यह जवाब न केवल गैर जिम्मेदाराना है बल्कि सरकारी कामकाज की भयावह सच्चाई को उजागर करता है।यह मामला अब केवल एक परिवार की परेशानी नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरे प्रशासनिक ढांचे की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा कर रहा है। अगर एक सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के बाद उसके परिवार को पेंशन पाने के लिए इतने लंबे समय तक संघर्ष करना पड़े तो फिर व्यवस्था पर भरोसा कैसे कायम रहेगा।सरकार और संबंधित विभागों को तुरंत हस्तक्षेप कर फाइल की स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करनी चाहिए और पीड़ित परिवार को तत्काल पेंशन दिलानी चाहिए। देरी अब केवल लापरवाही नहीं बल्कि अन्याय बन चुकी है।यदि अब भी कार्रवाई नहीं हुई तो यह मामला प्रशासनिक असंवेदनशीलता का प्रतीक बन जाएगा और लोगों में आक्रोश बढ़ना तय है। एक परिवार की पीड़ा को अनदेखा करना केवल अमानवीय ही नहीं बल्कि व्यवस्था की विफलता का खुला प्रमाण है। अब समय है कि जिम्मेदार जागें और मृत कर्मचारी के परिवार को न्याय मिले, वरना यह मुद्दा बड़े जनआक्रोश में बदल सकता है।

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