हमर छत्तीसगढ़

गरीब इंतज़ार में है पक्की छत का सपना या सियासी छलावा? प्रशासन है बेपरवाह

 

रिपोर्टर:- उत्तम साहू 

बालोद:- छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में गुरूर विकासखंड से उठती आवाज़ अब केवल शिकायत नहीं, बल्कि व्यवस्था पर सीधा आरोप बन चुकी है। सरकारें तकनीक, पारदर्शिता और विकास के बड़े-बड़े दावे कर रही हैं, लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि गरीबों की पक्की छत आज भी फाइलों में कैद है और सूची बनाने का खेल ही असली उद्योग बन चुका है।देश में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में योजनाओं को डिजिटल, तेज और भ्रष्टाचार-मुक्त बनाने की बात कही जाती है। वहीं प्रदेश और केंद्र में सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी सुशासन और गारंटी की राजनीति कर रही है। लेकिन गुरूर क्षेत्र के गांवों में हालात उल्टे दिखाई देते हैं — यहाँ तकनीक समाधान नहीं, बल्कि बहाना बन गई है।जिन परिवारों को योजना का असली हकदार माना जाना चाहिए, वे आज भी अधूरे मकानों, फटी तिरपालों और कच्ची दीवारों के बीच जीवन काट रहे हैं। कई लाभार्थी स्वीकृति के बाद भी वर्षों से किस्त का इंतजार कर रहे हैं। कुछ ने साहूकारों से कर्ज लेकर निर्माण शुरू किया, लेकिन भुगतान अटका तो छत आधी रह गई और कर्ज पूरा सिर पर चढ़ गया। दूसरी ओर, गांवों में ऐसे मकान भी खड़े दिखते हैं जो लोगों के मुताबिक पात्रता से ज्यादा पहचान और पहुंच के दम पर बने हैं।

यहाँ सबसे बड़ा सवाल टेक्नोलॉजी पर नहीं, उसे चलाने वालों पर है। पात्र-अपात्र तय करने के नाम पर घरों तक पहुँचे बिना फॉर्म भरना, मोबाइल से फोटो अपलोड कर देना और सूची बना देना — यही प्रक्रिया अब नियम बन चुकी है। परिणाम यह कि जिनके घर टूटे हैं वे सूची से बाहर, और जिनके पास पहले से पक्की दीवारें हैं वे लाभार्थी बन बैठे।स्थिति नगर पंचायत पलारी में और भी गंभीर दिखती है। ग्राम पंचायत से नगर पंचायत बनने के बाद लोगों को लगा था कि सुविधाएँ बढ़ेंगी, लेकिन उल्टा बुनियादी समस्याएँ और गहरी हो गईं। यहां मजदूरी कर जीवन चलाने वाले कई परिवार जर्जर झोपड़ियों में रह रहे हैं। उन्होंने आवेदन दिए, दस्तावेज़ जमा किए, उम्मीदें पाल लीं — लेकिन योजना अब भी कागज से बाहर नहीं निकली।

नगर पंचायत पलारी के स्थानीय मजदूर रवि कोसरे जैसे लोग कहते हैं कि वे रोज कमाकर थोड़ा-थोड़ा बचत कर रहे थे ताकि सरकारी सहायता मिलते ही घर बना सकें। अब उन्हें डर है कि कहीं उन्हें अपात्र घोषित कर पूरा सपना ही न छीन लिया जाए।योजना का असली संकट पैसा नहीं, नीयत और निगरानी है। जब सूची बनाने में ही खेल शुरू हो जाए, तो मकान बनने से पहले ही न्याय ढह जाता है। जरूरत है कागजी जांच नहीं, वास्तविक सर्वे की; ऑनलाइन दावा नहीं, मौके पर सत्यापन की; और सबसे बढ़कर जवाबदेही तय करने की।जब तक गरीब की छत राजनीति से ऊपर नहीं होगी, तब तक पक्के मकान का नारा केवल भाषण रहेगा गरीब का घर ?

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