पुलिस पर आरोप या कानून की परीक्षा? पुरूर प्रकरण ने बढ़ाई जवाबदेही की मांग

रिपोर्टर :- उत्तम साहू
बालोद :- छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में पुरूर थाना क्षेत्र से सामने आई घटना अब सिर्फ एक आत्महत्या की खबर नहीं रही, बल्कि यह कानून व्यवस्था, पुलिस आचरण और नागरिक अधिकारों की कसौटी बन गई है। ग्रामीणों ने खुलकर आरोप लगाए हैं कि भुजबल, सोनी और जैन नाम के तीन पुलिसकर्मियों द्वारा दबाव बनाया गया, बार-बार थाना बुलाया गया और पैसों की मांग की गई। यदि यह सच साबित होता है, तो यह मामला केवल विभागीय चूक नहीं, बल्कि विधिक उल्लंघन का गंभीर उदाहरण माना जाएगा।
भारतीय आपराधिक प्रक्रिया का सिद्धांत स्पष्ट है कि किसी भी नागरिक को पूछताछ के लिए बुलाने की प्रक्रिया लिखित आधार पर होनी चाहिए। नोटिस, समन या दर्ज अपराध के बिना लगातार बुलाना शक्ति के अनुचित प्रयोग की श्रेणी में आ सकता है। पुलिस नियमावली यह भी कहती है कि जांच के दौरान व्यक्ति की गरिमा, सामाजिक प्रतिष्ठा और मानसिक स्थिति का ध्यान रखना अनिवार्य है। मौखिक धमकी, अनौपचारिक दबाव या समझौते के नाम पर धन मांगना सेवा आचरण नियमों के खिलाफ है और यह भ्रष्टाचार, दुरुपयोग तथा आपराधिक कदाचार तक पहुंच सकता है।यदि किसी अधिकारी ने पद का इस्तेमाल निजी लाभ के लिए किया है, तो कानून में इसके लिए स्पष्ट दंड प्रावधान मौजूद हैं। विभागीय जांच, निलंबन, सेवा समाप्ति और भ्रष्टाचार संबंधी मुकदमा तक चल सकता है। वहीं यदि प्रताड़ना के कारण किसी व्यक्ति की मानसिक स्थिति प्रभावित हुई और उसने चरम कदम उठाया, तो यह मामला और भी गंभीर बन जाता है, क्योंकि कानून नागरिक की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ही बनाया गया है।लेकिन न्याय का मूल सिद्धांत संतुलन है। आरोपों का अस्तित्व अपने आप में दोष सिद्धि नहीं होता। इसलिए इस मामले में कॉल रिकॉर्ड, थाने की ड्यूटी डायरी, सीसीटीवी फुटेज, नोटिस रजिस्टर, गवाहों के बयान और पोस्टमार्टम रिपोर्ट निर्णायक भूमिका निभाएंगे। जांच निष्पक्ष, समयबद्ध और उच्च स्तर पर होनी चाहिए ताकि यह तय हो सके कि दबाव वास्तव में बना था या नहीं।यह प्रकरण हमें याद दिलाता है कि वर्दी केवल अधिकार का प्रतीक नहीं, बल्कि जवाबदेही का भार भी है। पुलिस का उद्देश्य नागरिकों में भय नहीं, विश्वास पैदा करना है। जब गांव का व्यक्ति थाने को सुरक्षा के बजाय चिंता का स्थान समझने लगे, तब व्यवस्था पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
आज जरूरत केवल सच्चाई सामने लाने की नहीं, बल्कि स्पष्ट संदेश देने की है कि कानून से ऊपर कोई नहीं। यदि गलती हुई है तो कार्रवाई दिखनी चाहिए, और यदि आरोप गलत हैं तो सच उतनी ही मजबूती से सामने आना चाहिए। क्योंकि न्याय केवल अदालत में नहीं, जनता के मन में स्थापित भरोसे से जीवित रहता है।



