बालोद की पंचायतें विकास से दूर,अफसर तिजोरी भर रहे, सरपंच कर्ज और बदनामी में दबे रहे हैं

बालोद। छत्तीसगढ़ में बालोद जिला की पंचायतों में विकास की प्रक्रिया पूरी तरह ठप हो गई है। गांवों में तालाब, नाली और आहता बनाने के लिए जो निधि उपलब्ध थी, वह योजनाओं तक पहुँचने से पहले ही अधिकारियों की तिजोरी में समा जाती है। सरपंच लगातार आर्थिक संकट और दबाव झेल रहे हैं, जबकि अधिकारी भव्य जीवन शैली अपनाए हुए हैं। महंगे बंगले, चमचमाती गाड़ियां और आलीशान सुविधाएं उनके आराम को दर्शाती हैं।
कई परियोजनाएँ पास होने के बाद भी भुगतान लंबित रहता है। कारण वही पुराना खेल, जिसमें रिश्वत और कमीशन का गहरा हाथ होता है। टटेंगा पंचायत में योजनाएँ महीनों से रुकी हुई हैं, वहीं सांकरा पंचायत की दीवारें जांच के इंतजार में पड़ी हैं। वर्षों बीत चुके हैं, सरकार बदली, सरपंच बदल गए, लेकिन भ्रष्टाचार की प्रणाली जस की तस बनी हुई है। सरपंचो का कहना है कि काम उनके द्वारा किया जाता है, पैसा उनके खातों में आता है, लेकिन अंतिम लाभ अधिकारी और कर्मचारी उठाते हैं। बिना चढ़ावे के कोई निर्माण या मरम्मत पूरा नहीं होती। यह केवल प्रणालीगत कमजोरी नहीं बल्कि भ्रष्टाचार का स्पष्ट प्रमाण है।
अधिकारी और कर्मचारी अपने भव्य जीवन में मग्न हैं, जबकि पंचायतों में काम रुका हुआ है और विकास की योजनाएं सिर्फ कागजों तक सीमित हैं। जनता के लिए यह स्थिति।निराशाजनक है क्योंकि सेवाओं का लाभ सीधे लोगों तक नहीं पहुँच पा रहा।बालोद जिले में यह समस्या व्यापक है। अधिकारी अपने फायदे के लिए निधि का उपयोग कर रहे हैं, जबकि सरपंच कर्ज और बदनामी के बोझ तले दबे हैं। पंचायतों में काम ठप हैं और प्रशासनिक प्रणाली जवाबदेही से दूर है।बालोद की पंचायतों की वास्तविक स्थिति यही है।अधिकारी अपनी तिजोरी भर रहे हैं।पंचायतें काम से खाली और असहाय हैं।सरपंच आर्थिक तंगी और बदनामी झेल रहे हैं।

विकास सिर्फ कागज़ों में दर्ज है।यह साफ सवाल पैदा करता है कि क्या यह व्यवस्था है या भ्रष्टाचार का स्थायी ठेका। जनता जानना चाहती है कि कब तक उनके हक की योजनाओं का लाभ अधिकारियों की चमक-धमक में ही समाप्त होता रहेगा।



