खुले सवाल क्या बच्चों का भविष्य ताले में बंद स्कूल सहगांव बन गया है?प्रशासनिक प्रयोगशाला

बालोद:- छत्तीसगढ़ के बालोद जिले के डौंडीलोहारा ब्लॉक से सामने आई तस्वीर किसी सामान्य अव्यवस्था की नहीं, बल्कि शिक्षा तंत्र की भयावह गिरावट की कहानी कहती है। सहगाव की प्राथमिक पाठशाला में स्कूल पर जड़ा ताला सिर्फ एक भवन को बंद नहीं करता, बल्कि बचपन की उम्मीदों, सीखने के अधिकार और संविधान की आत्मा को कैद कर देता है। कारण बताया जा रहा है—शिक्षकों की कमी और पढ़ाई का ठप होना। पर असली सवाल यह नहीं कि शिक्षक क्यों नहीं हैं, बल्कि यह है कि जिसे जिम्मेदारी सौंपी गई थी, वह जिम्मेदारी निभा कहाँ रहा है?
ब्लॉक शिक्षा अधिकारी स्तर पर प्राथमिकताओं का जो चेहरा उभरकर सामने आ रहा है, वह डराने वाला है। जब ब्लॉक के भीतर स्कूलों की सांसें उखड़ रही हों, तब बाहरी आयोजनों और अतिरिक्त दायित्वों में डूबा प्रशासन किस नीति का पालन कर रहा है? जंबूरी जैसे आयोजनों में नोडल बनना यदि प्राथमिक विद्यालयों की कीमत पर हो, तो यह महज चूक नहीं, बल्कि बौद्धिक अपराध है। शिक्षा व्यवस्था को शोपीस बना देना और बच्चों की रोज़मर्रा की कक्षा को हाशिये पर डाल देना—यह सोच गंदी नीति का प्रमाण है।स्थानीय स्तर पर उठ रहे गंभीर आरोप—कि वित्तीय अनियमितताओं की फिराक में प्रशासनिक ऊर्जा भटक रही है—स्वतः ही स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की मांग करते हैं। यहां दो टूक बात जरूरी है अगर आरोप गलत हैं, तो पारदर्शिता से सफाई क्यों नहीं?और अगर आरोप सही दिशा में इशारा कर रहे हैं, तो कार्रवाई क्यों नहीं?
ताले का जवाब जांच नहीं हो सकता। बच्चों को सजा देकर सिस्टम को बचाया नहीं जा सकता।प्राथमिक विद्यालय का बच्चा नियमावली नहीं पढ़ता। वह समझता है—आज स्कूल खुलेगा या नहीं, गुरु मिलेंगे या नहीं, किताब में आज नया शब्द आएगा या नहीं। उसकी मन-प्रवृत्ति को भरोसा चाहिए। बार-बार स्कूल बंद होना उसके भीतर यह भाव भर देता है कि पढ़ाई जरूरी नहीं, कि व्यवस्था भरोसे के लायक नहीं। यह भाव आगे चलकर ड्रॉपआउट, मजदूरी और हताशा में बदलता है। यह नुकसान आंकड़ों में नहीं दिखता, लेकिन पीढ़ियों तक पीछा करता है।जिला और ब्लॉक शिक्षा अधिकारी की नीतियां यदि कागज़-केंद्रित और कार्यक्रम-प्रधान हो जाएं, तो नतीजा यही होता है—खाली कक्षाएं, टूटता अनुशासन और बुझता भविष्य। शिक्षा विभाग का कर्तव्य केवल आदेश जारी करना नहीं, बल्कि हर बच्चे को रोज़ पढ़ाई दिलाना है। जो नीति स्कूल बंद कराए, वह नीति नहीं—प्रशासनिक दिवालियापन है।
मोहन निषाद, सामाजिक कार्यकर्ता का कथन है कि
“प्राथमिक स्कूल पर ताला लगना प्रशासन के मुंह पर तमाचा है। यह सीधे-सीधे गरीब और ग्रामीण बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ है। जब अधिकारी आयोजनों और पदों की दौड़ में लग जाएं और गांव का बच्चा बिना पढ़ाई घर बैठ जाए, तो समझ लेना चाहिए कि व्यवस्था ने अपना नैतिक अधिकार खो दिया है। हम मांग करते हैं कि सहगाव स्कूल तुरंत खोला जाए, शिक्षकों की व्यवस्था हो और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच की जाए। बच्चों का भविष्य किसी की महत्वाकांक्षा की बलि नहीं चढ़ने दिया जाएगा।”आज जरूरत है कड़े शब्दों से अधिक कड़े फैसलों की। तत्काल शिक्षक व्यवस्था, सार्वजनिक जवाबदेही और समयबद्ध सुधार—यही एकमात्र रास्ता है। क्योंकि स्कूल पर ताला लगना सिर्फ प्रशासनिक विफलता नहीं, यह समाज के भविष्य पर हमला है।



