हमर छत्तीसगढ़

बालोद जिला में पराली जलाने पर किसानों पर कहर, अवैध ईंट भट्ठों पर मेहरबानी — शासन-प्रशासन की दोहरी गारंटी उजागर

 

बालोद/पलारी :- छत्तीसगढ़ के बालोद जिला में र्यावरण संरक्षण, मिट्टी की उर्वरता और फसलों की सुरक्षा के नाम पर पराली जलाने वाले किसानों पर शासन-प्रशासन की नजर गिद्ध जैसी तेज हो जाती है। खेत में धान कटाई के बाद पैरा जलाया नहीं कि नोटिस, जुर्माना और कार्रवाई की तलवार लटक जाती है। लेकिन यही शासन-प्रशासन तब आंखें मूंद लेता है, जब उन्हीं खेतों, खुले भाठों और शासकीय-निजी जमीन पर बिना अनुमति अवैध ईंट भट्ठे धधकते नजर आते हैं। सवाल सीधा है—क्या कानून सिर्फ कमजोर किसान के लिए है? या फिर रसूखदार अपराधियों के लिए नियम केवल कागज तक सीमित हैं?खुलेआम संचालित हो रहे अवैध ईंट भट्ठे न केवल पर्यावरण के दुश्मन बने हुए हैं, बल्कि खेती, जंगल और इंसानी सेहत पर भी सीधा हमला कर रहे हैं। हरे-भरे पेड़ों की अंधाधुंध कटाई, प्रतिबंधित अर्जुन जैसे वृक्षों को ईंट पकाने की भट्टियों में झोंकना, खेतों की उपजाऊ मिट्टी का अवैध खनन—सब कुछ बेखौफ होकर किया जा रहा है। इसके बावजूद संबंधित विभागों की चुप्पी यह संकेत देती है कि या तो संरक्षण मिला हुआ है या फिर सांठगांठ इतनी मजबूत है कि कार्रवाई की हिम्मत ही नहीं होती।भट्ठों की चिमनियों से निकलने वाला जहरीला धुआं पूरे इलाके की आबोहवा को बीमार बना रहा है। नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और अन्य प्रदूषक तत्वों से सांस की बीमारियां बढ़ रही हैं। राख और धूल हवा के साथ उड़कर घरों, खेतों और जलस्रोतों में जम रही है। परिणामस्वरूप मृदा क्षरण तेज हो रहा है, जलवायु असंतुलन बढ़ रहा है और आमजन संक्रमणों की चपेट में आ रहे हैं। जिन किसानों-मजदूरों को खेतों में काम करना चाहिए, वे प्रदूषण के कारण खेतों का रुख तक नहीं कर पा रहे।इतना ही नहीं, अवैध ईंट भट्ठा संचालक दूर-दराज से मजदूरों को लाकर काम करा रहे हैं, लेकिन उनकी सूचना न तो प्रशासन को दी जाती है, न पुलिस को। यह न केवल श्रम कानूनों का उल्लंघन है, बल्कि सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के लिए भी गंभीर खतरा है। ऊपर से चोरी की बिजली, अवैध जल उपयोग और मिट्टी की लूट—हर मोर्चे पर नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। शासकीय और निजी जमीन का खनन कर राजस्व को भारी नुकसान पहुंचाया जा रहा है, जबकि जिम्मेदार विभाग मूकदर्शक बने हुए हैं।ग्रामीणों में रोष इसलिए भी है क्योंकि तहसीलदार स्तर पर निष्क्रियता साफ दिखती है। गांव में चल रहे अवैध ईंट भट्ठों से उपजे प्रदूषण, स्वास्थ्य संकट और पर्यावरणीय क्षति के बावजूद ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे। परिणामस्वरूप, तहसीलदार की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं और मिलीभगत की चर्चाएं जोर पकड़ रही हैं। जब शिकायतें दर्ज हों, सबूत मौजूद हों और नुकसान प्रत्यक्ष दिखे, तब भी कार्रवाई न होना प्रशासन की मंशा पर गहरा संदेह पैदा करता है।यह विडंबना ही नहीं, बल्कि अन्याय है कि एक ओर पराली जलाने पर किसानों को अपराधी बनाया जाता है, वहीं दूसरी ओर अवैध ईंट भट्ठों को खुली छूट मिलती है। यदि शासन-प्रशासन वास्तव में पर्यावरण संरक्षण को लेकर गंभीर है, तो कार्रवाई का पैमाना समान होना चाहिए। कानून सबके लिए बराबर हो—चाहे वह किसान हो या कथित रसूखदार भट्ठा संचालक।अब समय है कि दोहरी नीति खत्म हो। अवैध ईंट भट्ठों को तत्काल बंद किया जाए, दोषियों पर कठोर दंड लगे, क्षतिग्रस्त पर्यावरण की भरपाई कराई जाए और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय हो। वरना यह “गारंटी” केवल पोस्टर-बैनरों तक सिमटकर रह जाएगी, और धरती, खेती व इंसान—तीनों इसकी कीमत चुकाते रहेंगे।

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