हमर छत्तीसगढ़
सुशासन या पक्षपात? आमजन की अनसुनी, कार्यकर्ताओं की सुनवाई पर उठते तीखे सवाल

रिपोर्टर उत्तम साहू
बालोद पलारी:- छत्तीसगढ़ में सुशासन के दावों के बीच अब जमीनी हकीकत को लेकर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। जिला बालोद के नगर पंचायत पलारी के रवि कोसरे ने प्रशासनिक कार्यशैली पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि जनदर्शन और जनसमस्या शिविर अब दिखावे के मंच बनते जा रहे हैं, जहां सुनवाई कम और औपचारिकता ज्यादा नजर आती है।
उन्होंने कहा कि हर मंगलवार को जिला कलेक्टरों द्वारा आयोजित जनदर्शन में लोग अपनी मूलभूत समस्याएँ लेकर पहुंचते हैं—टूटी सड़कें, जर्जर स्कूल, बदहाल अस्पताल, बिजली संकट और पेयजल जैसी आवश्यक जरूरतें। ग्रामीण और शहरी नागरिक उम्मीद लेकर आवेदन देते हैं, लेकिन समाधान की रफ्तार इतनी धीमी है कि जनता में भरोसा कमजोर पड़ता जा रहा है। कागजों में कार्रवाई दर्ज होती है, मगर धरातल पर बदलाव दुर्लभ दिखता है।
सबसे बड़ा सवाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पीएम आवास योजना (ग्रामीण) को लेकर उठाया गया। कोसरे का आरोप है कि गरीबों ने आवेदन दिए, सर्वे हुए, सूची बनी—फिर भी कई वास्तविक पात्र आज भी कच्चे घरों में रह रहे हैं। दूसरी ओर, रोज नए मकानों की संख्या बढ़ने के दावे, गृहप्रवेश समारोह और चाबी वितरण के आयोजन प्रशासन की प्राथमिकताओं पर संदेह पैदा कर रहे हैं। आमजन पूछ रहे हैं—जब हमने आवेदन दिए, तो फिर ये मकान किन लोगों के बन रहे हैं?
राजधानी रायपुर में आयोजित समाधान शिविरों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि सरकार ने इन्हें जनता की राहत का माध्यम बताया था, लेकिन अब चर्चा है कि शिविरों का फोकस आम लोगों से हटकर राजनीतिक कार्यकर्ताओं की समस्याओं की ओर झुकता दिख रहा है। यदि यह धारणा सच साबित होती है, तो यह प्रशासनिक निष्पक्षता पर सीधा प्रहार होगा।कोसरे ने तीखे शब्दों में कहा कि सुशासन का अर्थ प्रचार, पोस्टर और कार्यक्रमों की चमक नहीं होता; सुशासन वह है जहां सबसे कमजोर व्यक्ति की आवाज पहले सुनी जाए। यदि सत्ता केवल समर्थकों के लिए सक्रिय दिखे और आम नागरिक दर-दर भटके, तो यह लोकतंत्र नहीं, बल्कि राजनीतिक सुविधा का तंत्र कहलाएगा।उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार को आत्ममंथन करना चाहिए। जनता ने भरोसा देकर सत्ता सौंपी है, बदले में न्यायपूर्ण व्यवस्था की उम्मीद है, न कि चयनात्मक संवेदनशीलता की। यदि योजनाओं का लाभ पात्रों तक पारदर्शिता से नहीं पहुँचेगा, तो नाराजगी सियासी मुद्दा बनते देर नहीं लगेगी।



