हमर छत्तीसगढ़

डबल इंजन सरकार घोषणाओं में सॉय-सॉय, निभाने में आँय-बॉय मतदान में सभी पात्र, योजनाओं में अपात्र

 

रिपोर्टर:- उत्तम साहू 

बालोद / पलारीः– केन्द्र एवं छत्तीसगढ़ प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के सत्ता शासक अपने लोकलुभावन भाषणों में विकसित भाजपा की बात करते हैं। अभी केन्द्र और प्रदेश में सत्ता होने के बावजूद अपने कार्यकाल में आमजनों को लुभाने के लिए घोषणाएँ तो की जा रही हैं, पर संचालन नहीं। समर्थकों को विभिन्न मोर्चों में पद बाँटे जा रहे हैं, लेकिन आमजनों की समस्याओं के समाधान के लिए कोई मोर्चा सक्रिय नहीं दिखता। चुनावों के समय पात्र मतदाताओं की सूची बनती है और लोगों को घर से मतदान केन्द्र तक ले जाया जाता है, पर झोपड़ी और जर्जर मकानों में रह रहे लोगों को घर देने की योजना में कोई रुचि दिखाई नहीं देती।जिले के विकासखंड गुरूर में 112 गांव हैं, जो वनांचल और मैदानी दो हिस्सों में बँटे हैं। वनांचल क्षेत्र को छोड़ दें तो मैदानी क्षेत्र के ग्रामीण आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। अधिकांश गांवों में सड़क, बिजली, पानी, अस्पताल और स्कूल जैसी सुविधाओं का इंतजार है। प्रदेश सरकार द्वारा राष्ट्रीय ग्राम स्वराज अभियान, मुख्यमंत्री समग्र ग्रामीण विकास योजना, जिला पंचायत, जनपद पंचायत विकास निधि, ग्राम पंचायतों को अनुदान, मुख्यमंत्री पंचायत सशक्तिकरण, आंतरिक गली विद्युतीकरण तथा त्रिस्तरीय पंचायती राज संस्थाओं का क्षमता विकास जैसी योजनाएँ संचालित होने का दावा है, पर ये केवल घोषणाओं, पोस्टरों और बैनरों तक सीमित दिखती हैं। धरातल पर इनकी स्थिति नगण्य है और विकास का दावा प्रचार तक सिमट गया है।

यह स्थिति वर्तमान में संचालित प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण में स्पष्ट दिखती है। जर्जर, जीर्ण-शीर्ण, टूटे घरों और झोपड़ियों में रह रहे गरीब मजदूर जारी सूची में अपना नाम देखने को तरस रहे हैं। आवेदन देने वालों को त्रुटि तक बताने का समय नहीं है। दूसरी ओर प्रदेश सरकार वर्ष 2026-27 में विकास दर और प्रति व्यक्ति आय बढ़ने का दावा कर रही है तथा कह रही है कि छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था मजबूत और संतुलित है। समृद्ध किसान, मजबूत उद्योग और विस्तृत सेवा क्षेत्र को विकसित छत्तीसगढ़ की नींव बताया जा रहा है तथा हर परिवार को सशक्त बनाने का लक्ष्य घोषित किया जा रहा है।
इन बयानों के विपरीत राज्य में गरीबी का प्रमुख कारण कृषि आधारित अर्थव्यवस्था ही है, जो मानसून पर निर्भर रहती है। कृषि कार्य समाप्त होने के बाद खेतिहर मजदूरों को स्थानीय स्तर पर रोजगार नहीं मिलता और वे अन्य राज्यों में पलायन करने को मजबूर होते हैं। कई मामलों में मजदूरों को बंधक बनाकर काम कराया जाता है। कोरोना काल में मजदूरों की पैदल घर वापसी की त्रासदी आज भी याद है। पलायन रोकने, शारीरिक और मानसिक शोषण रोकने में व्यवस्था असफल दिखती है। ग्रामीणों की मूलभूत समस्याएँ आज भी चुनौती बनकर खड़ी हैं और बरसों से समाधान का इंतजार कर रही हैं। इनके बिना विकसित राज्य का सपना अधूरा ही रहेगा।यदि डबल इंजन सरकार गंभीरता से प्रयास करे तो इन समस्याओं का स्थायी समाधान संभव है। पर योजनाएँ कागजों और प्रचार तक सीमित हैं। बेघर गरीबों को पक्का मकान देने की घोषणाएँ बार-बार दोहराई जाती हैं, लेकिन समाधान के लिए कोई विशेष कार्यक्रम नहीं दिखता। आवेदन की संख्या बताने के लिए मुख्यमंत्री, कलेक्टर जनदर्शन और शिविरों का आयोजन तो होता है, पर नीति में बदलाव की प्रवृत्ति अधिक नजर आती है।हाल ही में प्रदेश सरकार ने होली पर शराब दुकानें खुली रखने का निर्देश दिया, फिर बंद रखने की बात कही। केन्द्र सरकार ने किसान सम्मान निधि की किस्त जारी की और प्रदेश सरकार ने भी होली से पहले धान खरीदी की राशि देने की घोषणा की, लेकिन अभी तक राशि जारी नहीं हुई है। त्योहार में केवल छह दिन शेष हैं, जिनमें शनिवार-रविवार की छुट्टियाँ भी हैं। यदि राशि जारी भी होती है तो बैंक में भीड़, सर्वर डाउन और अव्यवस्था से आमजन परेशान होंगे।

कहा जा सकता है कि घोषणाओं और वास्तविकता के बीच की दूरी ही सबसे बड़ी समस्या है। जब तक ग्रामीणों की मूलभूत सुविधाएँ, रोजगार और आवास की समस्याएँ हल नहीं होतीं, तब तक विकास के दावे लोगों को केवल भाषण ही प्रतीत होंगे। यदि व्यवस्था सचमुच संवेदनशील बने, तभी डबल इंजन सरकार की गारंटी आमजन के लिए भरोसे में बदलेगी।

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