सुहाग, श्रद्धा, स्वाभिमान और विश्वास पर चोट, चांदी के सपनों का गिलट सच
सम्मान का वादा या विश्वास के साथ खिलवाड़?"

संपादक:- मीनू साहू
बालोद:- छत्तीसगढ़ के महिला एवं बाल विकास विभाग से जुड़े एक मामले ने इन दिनों अनेक सवाल खड़े कर दिए हैं। जिन सुहागिन महिलाओं को चांदी का उपहार देने का दावा किया गया, वहां कथित रूप से गिलट अथवा कम गुणवत्ता वाली सामग्री वितरण की चर्चाएं सामने आने लगीं। यदि ये आरोप सही साबित होते हैं तो यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि उन भावनाओं की उपेक्षा मानी जाएगी जिनके नाम पर योजनाओं का प्रचार किया गया।
ग्रामीण क्षेत्रों में इस विषय को लेकर विशेष नाराजगी दिखाई दे रही है। गांवों की चौपालों, महिला समूहों और सामाजिक मंचों पर लोग पूछ रहे हैं कि यदि किसी योजना का उद्देश्य सम्मान देना था, तो गुणवत्ता और पारदर्शिता सुनिश्चित क्यों नहीं की गई। जब जनता के धन से संचालित कार्यक्रमों में ही संदेह की स्थिति उत्पन्न हो जाए तो भरोसे की नींव कमजोर पड़ने लगती है।भारतीय अध्यात्म का मूल संदेश है कि सत्य स्वयं प्रकाशमान होता है। उपनिषदों से लेकर संत परंपरा तक हर युग में यही कहा गया कि दिखावे की चमक अल्पकालिक होती है, जबकि सच्चाई का तेज स्थायी रहता है। यदि किसी योजना में अनियमितता हुई है तो उसे स्वीकार कर निष्पक्ष जांच कराना ही धर्म और प्रशासन दोनों की मर्यादा होगी।
सबसे बड़ा व्यंग्यात्मक प्रश्न यही बन गया है कि आरोप भी व्यवस्था पर, जवाब भी व्यवस्था का और जांच भी व्यवस्था के भीतर। ऐसे में आम नागरिक पूछ रहा है कि जब शिकायतों की पड़ताल उन्हीं अधिकारियों के माध्यम से होगी जिन पर प्रश्न उठ रहे हैं, तब निष्पक्ष निष्कर्ष तक पहुंचने का भरोसा कैसे बनेगा। लोकतंत्र में न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए।
भारतीय संस्कृति में सुहाग केवल श्रृंगार का आभूषण नहीं, बल्कि नारी सम्मान, पारिवारिक मंगल और आध्यात्मिक आस्था का जीवंत प्रतीक माना जाता है। सिंदूर, मंगलसूत्र, बिछिया अथवा चांदी से जुड़े सुहाग चिन्ह केवल धातु नहीं होते, वे भावनाओं, विश्वास और परंपराओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसे में यदि सम्मान के नाम पर किए गए वादों और वास्तविकता के बीच अंतर दिखाई दे तो स्वाभाविक रूप से जनमानस में असंतोष जन्म लेता है।
महिला एवं बाल विकास विभाग का दायित्व समाज के सबसे संवेदनशील वर्गों के हितों की रक्षा करना है। यदि उसी विभाग की किसी योजना पर अविश्वास के बादल मंडराने लगें तो यह चिंतन का विषय है। मातृशक्ति के सम्मान से जुड़ी किसी भी पहल में प्रतीकात्मकता नहीं, बल्कि ईमानदारी और संवेदनशीलता सर्वोपरि होनी चाहिए।आज छत्तीसगढ़ की जनता, विशेषकर ग्रामीण महिलाएं, केवल स्पष्टीकरण नहीं बल्कि सत्य, पारदर्शिता और जवाबदेही की अपेक्षा कर रही हैं। क्योंकि सुहाग का सम्मान किसी योजना का प्रचार नहीं, बल्कि करोड़ों महिलाओं की आस्था से जुड़ा विषय है। जब आस्था आहत होती है तो प्रश्न केवल वस्तु का नहीं रहता, व्यवस्था के चरित्र का भी हो जाता है।



