शाला प्रवेश उत्सव के पहले ही दिन शिक्षा व्यवस्था की पोल खुली, शिक्षक विहीन स्कूलों पर फूटा ग्रामीणों का गुस्सा
आरटीआई कार्यकर्ता यशवंत निषाद ने शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर किया तीखा प्रहार

संपादक:- मीनू साहू
बालोद :- छत्तीसगढ़ के बालोद जिला में एक ओर सरकार शाला प्रवेश उत्सव मनाकर शिक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का प्रचार कर रही है, वहीं दूसरी ओर जमीनी हकीकत शिक्षा तंत्र की भयावह बदहाली को उजागर कर रही है। डौंडी विकासखंड के काड़े प्राथमिक शाला में नए सत्र के पहले ही दिन स्कूल के मुख्य द्वार पर ताला लटक गया और ग्रामीणों को धरने पर बैठना पड़ा। यह घटना केवल एक स्कूल की समस्या नहीं, बल्कि पूरे जिले की चरमराई शिक्षा व्यवस्था का जीवंत प्रमाण है।
इसी बीच आरटीआई कार्यकर्ता यशवंत निषाद ने भी शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि जिले के दूरस्थ और आदिवासी क्षेत्रों में सरकारी स्कूल शिक्षक संकट से जूझ रहे हैं, जबकि बड़ी संख्या में शिक्षकों को विभिन्न कार्यालयों में प्रतिनियुक्ति देकर गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाया गया है। उनका आरोप है कि कई शिक्षक क्लर्क, डाटा एंट्री ऑपरेटर और अन्य प्रशासनिक जिम्मेदारियां निभा रहे हैं, जिससे स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी उत्पन्न हो गई है।
ग्रामीणों के अनुसार विद्यालय में लगभग 99 छात्र अध्ययनरत हैं, लेकिन उनके लिए मात्र दो शिक्षक उपलब्ध हैं। इनमें से एक शिक्षक मेडिकल अवकाश पर चले गए, जिसके बाद बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह भगवान भरोसे छोड़ दी गई। आक्रोशित ग्रामीणों ने सवाल उठाया कि जब कोकणा जैसे गांव में केवल 19 बच्चों के लिए तीन शिक्षक पदस्थ हैं, तो काड़े जैसे बड़े स्कूल को उपेक्षा का शिकार क्यों बनाया गया? यह असंतुलन प्रशासनिक अक्षमता और विभागीय लापरवाही की गंभीर मिसाल माना जा रहा है।
आरटीआई कार्यकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि नियमों को दरकिनार कर मनमाने तरीके से पदस्थापन और प्रतिनियुक्तियां की जा रही हैं, जबकि वास्तविक आवश्यकता वाले विद्यालयों को नजरअंदाज किया जा रहा है। इसका सीधा असर ग्रामीण और आदिवासी बच्चों की शिक्षा पर पड़ रहा है। शिक्षक-छात्र अनुपात पूरी तरह बिगड़ चुका है और बच्चों का भविष्य प्रशासनिक उदासीनता की भेंट चढ़ता दिखाई दे रहा है।
सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि समस्या नई नहीं है, फिर भी जिम्मेदार अधिकारियों ने समय रहते कोई प्रभावी समाधान नहीं निकाला। हालात इतने बिगड़ गए कि पुलिस और प्रशासन को मौके पर पहुंचकर ग्रामीणों को समझाना पड़ा। यह स्थिति बताती है कि शिक्षा विभाग की योजनाएं कागजों तक सीमित हैं और वास्तविकता में व्यवस्था जवाबदेही के संकट से जूझ रही है।
ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मांग की है कि कार्यालयों में प्रतिनियुक्त शिक्षकों को तत्काल स्कूलों में वापस भेजा जाए, शिक्षक रिक्तियों को भरा जाए और शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त अव्यवस्था, पक्षपात तथा प्रशासनिक निष्क्रियता की निष्पक्ष जांच कर दोषियों पर कठोर कार्रवाई की जाए। अन्यथा शाला प्रवेश उत्सव जैसे कार्यक्रम केवल दिखावा बनकर रह जाएंगे और बच्चों का भविष्य लगातार अंधकार की ओर धकेला जाता रहेगा।



