सत्ता की छाया में ईंटों की आग भाजपा जिला अध्यक्ष के गांव में कथित अवैध ईंट भट्ठा बेनकाब

बालोद:- छत्तीसगढ़ के बालोद जिले की डौंडीलोहारा तहसील अंतर्गत ग्राम बुरहानपुर से जो तस्वीरें और जानकारियां सामने आ रही हैं, वे लोकतंत्र, कानून और संवेदनशीलता—तीनों पर करारा तमाचा हैं। आरोप है कि भाजपा जिला अध्यक्ष चेमन देशमुख के गांव में खुलेआम अवैध लाल ईंट निर्माण किया जा रहा है, जहां महासमुंद जिले के पिथौरा क्षेत्र से पलायन कर आए चार परिवार अमानवीय हालात में जीवन काटने को मजबूर हैं। इन परिवारों में मासूम बच्चे भी शामिल हैं, जिनके लिए न शिक्षा की व्यवस्था है, न रहने की सुरक्षित छत और न ही किसी तरह की मानक सुरक्षा।सूत्रों के अनुसार, कथित ईंट भट्ठे में न तो श्रम विभाग की अनुमति दिखाई देती है, न प्रदूषण नियंत्रण के मानकों का पालन। धुएं, राख और तपती भट्टियों के बीच बच्चों का बचपन झुलस रहा है। यह वही दौर है जब मंचों से “शिक्षा जरूरी है” के नारे गूंजते हैं, मगर जमीन पर कथित तौर पर बच्चों को किताब की जगह ईंट थमाई जा रही है। सवाल यह नहीं कि नारे क्यों खोखले हैं—सवाल यह है कि जिम्मेदारी किसकी है?आरोप यह भी है कि अवैध भूसा और ईंटों का परिवहन बिना वैध पर्ची के धड़ल्ले से किया जा रहा है। नियमों की किताब यहां शायद धूल फांक रही है, क्योंकि कार्रवाई कहीं दिखाई नहीं देती। यदि यह सब सच है, तो प्रशासन की चुप्पी क्या संकेत देती है? क्या सत्ता की नजदीकी ने कानून की आंखों पर पट्टी बांध दी है? या फिर निरीक्षण केवल कागजों तक सीमित रह गया है?ग्रामीणों का कहना है कि काम की तलाश में आए ये परिवार न्यूनतम सुविधाओं से भी वंचित हैं। पीने का साफ पानी, शौचालय, प्राथमिक चिकित्सा—सब कुछ कथित तौर पर नदारद है। श्रम कानून बच्चों को ऐसे जोखिम भरे काम से दूर रखने की बात करता है, मगर यहां जोखिम ही रोज़गार बन गया है। यह कैसा विकास है, जिसमें ईंटें तो पकती हैं, पर इंसानियत कच्ची रह जाती है?राजनीतिक नैतिकता पर भी गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं। जब प्रभावशाली पदों पर बैठे लोग अपने आसपास हो रही कथित अवैध गतिविधियों से अनजान बनने का दावा करते हैं, तो भरोसा टूटता है। यदि आरोप निराधार हैं, तो निष्पक्ष जांच से सच्चाई सामने आनी चाहिए। और यदि आरोप सही हैं, तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए—कानून सबके लिए समान होना चाहिए, नाम और पद के लिए अलग नहीं।
यह मामला केवल एक गांव या एक भट्ठे का नहीं है। यह उस व्यवस्था का आईना है, जहां गरीब का श्रम सस्ता और कानून लचीला हो जाता है। प्रशासन, श्रम विभाग, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और पुलिस—सबकी भूमिका पर सवाल है। क्या जांच होगी? क्या बच्चों को स्कूल की राह मिलेगी? क्या श्रमिकों को मानक सुरक्षा और सम्मान मिलेगा?जनता जवाब चाहती है, और जवाब सिर्फ बयान से नहीं—कार्रवाई से आएगा। कथित अवैध भट्ठे की तत्काल जांच, परिवहन के दस्तावेजों की पड़ताल, श्रमिकों का पुनर्वास और बच्चों की शिक्षा सुनिश्चित करना—यही कसौटी है। वरना इतिहास गवाह रहेगा कि ईंटों की आग में कानून और संवेदना दोनों झुलसते रहे।



