भूमकाल की विरासत का अपमान! परिवहन संघ की मनमानी पर उठी आदिवासी समाज की बुलंद आवाज

संपादक :- मीनू साहु
बस्तर:- छत्तीसगढ़ के जिला दंतेवाड़ा की धरती, जो शौर्य और संघर्ष की गाथाओं से भरी हुई है, वहां एक बार फिर आदिवासी समाज ने अपने अधिकारों और सम्मान की रक्षा के लिए मजबूत कदम उठाया है। जिला धुरवा समाज दंतेवाड़ा ने 5 मार्च 2026 को जिला कलेक्टर को एक महत्वपूर्ण ज्ञापन सौंपते हुए परिवहन संघ BTOA की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की दरअसल, इस वर्ष दंतेवाड़ा जिले में भूमकाल स्मृति दिवस की 116वीं वर्षगांठ बड़े पैमाने पर मनाने की तैयारी की गई थी। यह आयोजन केवल एक कार्यक्रम नहीं बल्कि आदिवासी अस्मिता, संघर्ष और गौरव का प्रतीक था। स्वतंत्रता संग्राम के महानायक क्रांतिवीर अमर शहीद गुंडाधुर की वीरता और बलिदान को याद करते हुए हजारों लोगों के जुटने की योजना बनाई गई थी। कटेकल्याण, कुआकोण्डा, गीदम, बारसूर, बचेली और दंतेवाड़ा सहित कई क्षेत्रों के ग्रामीणों ने इसमें शामिल होने की सहमति भी जताई थी।ग्रामीणों को कार्यक्रम स्थल तक पहुंचाने के लिए जिले के एकमात्र परिवहन संगठन BTOA से वाहन उपलब्ध कराने का आग्रह किया गया था, जिस पर प्रारंभ में सहमति भी दी गई थी। लेकिन आयोजन के दिन अचानक परिवहन संघ पीछे हट गया। इस अप्रत्याशित रवैये के कारण बड़ी संख्या में ग्रामीण कार्यक्रम में शामिल नहीं हो सके और ऐतिहासिक आयोजन प्रभावित हो गया। इस घटना ने समाज में आक्रोश और निराशा दोनों को जन्म दिया।धुरवा समाज ने अपने ज्ञापन में स्पष्ट कहा कि जिले में लौह अयस्क परिवहन से करोड़ों की कमाई करने वाला यह संघ स्थानीय समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने में पूरी तरह विफल साबित हो रहा है। इसी कारण संगठन की स्थापना से अब तक की आर्थिक गतिविधियों की गहन जांच की मांग उठाई गई है।इसके साथ ही यह भी आरोप लगाया गया कि संघ में बाहरी राज्यों के लोगों को मनमाने तरीके से सदस्य बनाया जा रहा है, जबकि स्थानीय युवाओं को अवसर नहीं दिया जा रहा। कई वाहनों के दूसरे जिलों से जुड़े होने की भी आशंका जताई गई, जिसकी जांच आवश्यक बताई गई।समाज ने यह भी मुद्दा उठाया कि नए सदस्यों को जोड़ते समय ग्राम सभाओं और स्थानीय मूल निवासियों को कोई जानकारी नहीं दी जाती, जिससे रोजगार के अवसर छिन रहे हैं। पेसा कानून लागू होने के बावजूद संघ के शीर्ष पद पर आदिवासी प्रतिनिधित्व नहीं होना भी गंभीर सवाल खड़ा करता है।इतना ही नहीं, आदिवासी जमीनों पर कब्जा कर भवन निर्माण और वन भूमि में ट्रकों की अवैध पार्किंग जैसे मामलों को भी प्रशासन के सामने रखा गया। इन सभी बिंदुओं पर ठोस जांच और दोषियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की मांग की गई।जिला कलेक्टर ने पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए निष्पक्ष जांच और उचित कार्रवाई का आश्वासन दिया है। अब निगाहें प्रशासन की कार्रवाई पर टिकी हैं, क्योंकि यह मामला केवल एक संगठन की कार्यप्रणाली का नहीं बल्कि आदिवासी सम्मान, अधिकार और न्याय की लड़ाई का प्रतीक बन चुका है।



