छत्तीसगढ़ी भाषा के सम्मान की हुंकार — बालोद में 8 मार्च को गूंजेगी छत्तीसगढ़ी अस्मिता की आवाज

संपादक:- मीनू साहु
बालोद:- छत्तीसगढ़ के बालोद जिला की धरती अपनी समृद्ध संस्कृति, परंपरा और बोली-बानी के लिए जानी जाती है। लेकिन विडंबना यह है कि राज्य निर्माण के ढाई दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी छत्तीसगढ़ी भाषा को वह प्रतिष्ठा और अधिकार नहीं मिल पाया, जिसकी वह वास्तविक हकदार है। शासन-प्रशासन से लेकर शिक्षा व्यवस्था तक, अपनी ही धरती की मातृभाषा को बार-बार उपेक्षा का सामना करना पड़ रहा है। यही कारण है कि अब समाज के बुद्धिजीवी, साहित्यकार और जागरूक नागरिक इस मुद्दे पर खुलकर आवाज बुलंद करने के लिए आगे आ रहे हैं।इसी उद्देश्य को लेकर 8 मार्च को बालोद में एक महत्वपूर्ण साहित्यिक और वैचारिक आयोजन होने जा रहा है, जहां छत्तीसगढ़ी भाषा के सम्मान, संरक्षण और उसके व्यापक उपयोग को लेकर गंभीर चर्चा होगी। बालोद के कला केंद्र में आयोजित होने वाली इस विशेष गोष्ठी में प्रदेश के कई जाने-माने साहित्यकार, चिंतक और समाजसेवी एक मंच पर एकत्र होकर मातृभाषा के अधिकार की बात करेंगे।कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ी समाज के अध्यक्ष डॉ. सत्यजीत साहू मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहेंगे, जबकि जनसंपर्क सचिव घनश्याम गजपाल कार्यक्रम की अध्यक्षता करेंगे। आयोजन की तैयारी पिछले कई दिनों से लगातार चल रही है और इसे भव्य एवं सार्थक बनाने के लिए समाज के कई वरिष्ठ व्यक्तित्व सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार करने में ऋतेश्वरानंद अवधूत, तामस्कर साहू और हेमलाल सोनबोईर के साथ वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. अशोक आकाश का विशेष मार्गदर्शन रहा है।इस वैचारिक मंच पर प्रदेश के अलग-अलग जिलों से आए प्रतिष्ठित साहित्यकार अपने विचारों के माध्यम से छत्तीसगढ़ी भाषा की वर्तमान स्थिति, उसके भविष्य और उसे शासन-प्रशासन तथा शिक्षा में लागू करने की आवश्यकता पर चर्चा करेंगे। विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े विद्वानों की उपस्थिति इस कार्यक्रम को और अधिक सार्थक बनाएगी।मंच संचालन की जिम्मेदारी वीरेन्द्र अजनबी संभालेंगे, जबकि सह-संचालन हर्षा देवांगन द्वारा किया जाएगा। आयोजन समिति का मानना है कि यह सिर्फ एक साहित्यिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि अपनी मातृभाषा की अस्मिता और सम्मान की रक्षा के लिए एक मजबूत पहल है।छत्तीसगढ़ी समाज बालोद ने क्षेत्र के युवाओं, किसानों, मजदूरों और मातृशक्ति से विशेष अपील की है कि वे बड़ी संख्या में इस आयोजन में शामिल होकर अपनी मातृभाषा के सम्मान की इस मुहिम को और मजबूत बनाएं। जब समाज अपनी जड़ों से जुड़ता है, तभी संस्कृति जीवित रहती है और भाषा को उसका असली गौरव प्राप्त होता है।
8 मार्च को बालोद की धरती पर होने वाला यह आयोजन निश्चित रूप से छत्तीसगढ़ी भाषा के अधिकार और सम्मान की दिशा में एक नई चेतना जगाने वाला साबित होगा



