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फोटो शूट में हरियाली, जमीन पर सूखे पौधे! बारिश नहीं तो आखिर जिम्मेदार कौन?

नेताओं, अधिकारियों और समाजसेवियों की कतार लगती है। कैमरे चमकते हैं, पौधे रोपे जाते हैं, भाषणों में पर्यावरण संरक्षण की लंबी-लंबी बातें होती हैं और अगले दिन अखबारों में तस्वीरें छप जाती हैं।

संपादक :- मीनू साहू 

बालोद:- छत्तीसगढ़ के बालोद जिला में जून का महीना ढलान पर है, आसमान बादलों से आंख-मिचौली खेल रहा है और धरती तपिश से कराह रही है। खेतों में किसान आसमान की ओर टकटकी लगाए बैठे हैं, लेकिन बरसात अब तक मेहमान बनी हुई है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर बारिश की इस बेरुखी के लिए जिम्मेदार कौन है? क्या केवल मौसम, मानसून और प्रकृति को दोष देकर हम अपनी जिम्मेदारियों से बच सकते हैं?

हर साल पर्यावरण दिवस, वन महोत्सव और सावन के नाम पर पौधारोपण के बड़े-बड़े आयोजन होते हैं। नेताओं, अधिकारियों और समाजसेवियों की कतार लगती है। कैमरे चमकते हैं, पौधे रोपे जाते हैं, भाषणों में पर्यावरण संरक्षण की लंबी-लंबी बातें होती हैं और अगले दिन अखबारों में तस्वीरें छप जाती हैं। लेकिन असली सवाल यह है कि उन पौधों का आगे क्या हुआ? कितने पौधे पेड़ बने और कितने फोटो खिंचवाने के बाद भगवान भरोसे छोड़ दिए गए?

विडंबना देखिए, जब बारिश देर से होती है तो सबसे पहले वन विभाग को कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। आरोपों की बौछार शुरू हो जाती है कि जंगल कट रहे हैं, लकड़ी तस्कर सक्रिय हैं और पर्यावरण बिगड़ रहा है। यदि वास्तव में अवैध कटाई हो रही थी तो वर्षों तक चुप्पी साधे रहने वाले लोग तब कहां थे? शिकायत क्यों नहीं हुई? कार्रवाई की मांग क्यों नहीं उठी? केवल मंच और माइक मिलने पर पर्यावरण प्रेम जाग जाना भी एक तरह की मौसमी सक्रियता ही है।

इतिहास गवाह है कि किसी भी व्यवस्था में अच्छे और बुरे दोनों तरह के लोग होते हैं। रामायण की स्वर्णिम लंका में भी विभीषण था, जिसने सच का साथ दिया। इसलिए पूरे तंत्र को कठघरे में खड़ा करने से पहले आत्ममंथन भी जरूरी है।मौसम विभाग के अनुसार दक्षिण-पश्चिम मानसून की रफ्तार फिलहाल धीमी है। केरल में भी मानसून की एंट्री सामान्य समय से विलंब से हुई, जिसका असर छत्तीसगढ़ पर भी पड़ा है। बस्तर क्षेत्र में प्री-मानसून गतिविधियां जरूर शुरू हुई हैं, लेकिन प्रदेशभर में झमाझम बारिश के लिए अभी कुछ और इंतजार करना पड़ सकता है।

सच्चाई यह है कि पर्यावरण केवल भाषणों, बैनरों और फोटोशूट से नहीं बचता। पेड़ लगाने से ज्यादा जरूरी उन्हें जीवित रखना है। यदि हर वर्ष लगाए गए पौधों की ईमानदारी से देखभाल होती, तो शायद आज बारिश की देरी पर चिंता कम और हरियाली पर गर्व ज्यादा होता। प्रकृति हिसाब जरूर रखती है, चाहे इंसान भूल जाए।

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