हमर छत्तीसगढ़

डबल इंजन का दंभ धरा रह गया, पलारी में कांग्रेस की एकजुटता के आगे भाजपा की रणनीति हुई बेअसर

भाजपा समर्थकों को उम्मीद थी कि सत्ता और संसाधनों के प्रभाव से समीकरण बदले जा सकते हैं, लेकिन कांग्रेस की एकजुटता ने सभी अटकलों पर विराम लगा दिया।

 

संपादक:- मीनू साहू 

बालोद :- छत्तीसगढ़ के बालोद जिला में नवगठित नगर पंचायत पलारी में हुए पहले चुनाव के बाद स्थानीय राजनीति में दिलचस्प घटनाक्रम देखने को मिला। 15 वार्डों वाली इस नगर पंचायत में कांग्रेस ने अध्यक्ष पद सहित 10 वार्डों में जीत दर्ज कर स्पष्ट जनसमर्थन हासिल किया। चुनाव परिणामों ने यह संदेश दे दिया कि जनता ने स्थानीय मुद्दों, जनसंपर्क और संगठनात्मक मजबूती को प्राथमिकता दी है।

राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि चुनावी पराजय के बाद भाजपा नेताओं ने अपनी हार के कारणों पर आत्ममंथन करने के बजाय प्रशासनिक प्रक्रियाओं पर सवाल उठाने की राह अपनाई। नगर पंचायत के शपथ ग्रहण कार्यक्रम को लेकर तरह-तरह के आरोप लगाए गए, लेकिन इन आरोपों का कोई ठोस आधार सामने नहीं आ सका। इसके बाद भाजपा के पांच निर्वाचित पार्षदों का अलग से शपथ ग्रहण कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसे लेकर भी कई सवाल उठे।

स्थानीय लोगों का कहना है कि जिस कार्यक्रम को शक्ति प्रदर्शन के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की गई, वह अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर सका। व्यवस्थाओं को लेकर भी चर्चाएं होती रहीं। वहीं राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि जनता के जनादेश को स्वीकार करने के बजाय अलग-अलग बहाने तलाशना लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं माना जा सकता।

नगर पंचायत में उपाध्यक्ष पद के चुनाव ने भी राजनीतिक समीकरणों की असली तस्वीर सामने रख दी। भाजपा समर्थकों को उम्मीद थी कि सत्ता और संसाधनों के प्रभाव से समीकरण बदले जा सकते हैं, लेकिन कांग्रेस की एकजुटता ने सभी अटकलों पर विराम लगा दिया। पार्टी के निर्वाचित प्रतिनिधियों ने संगठन के प्रति निष्ठा और अनुशासन का परिचय देते हुए एकजुट होकर मतदान किया, जिसके परिणामस्वरूप उपाध्यक्ष पद भी कांग्रेस के खाते में गया।

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि पलारी का जनादेश केवल चुनावी जीत नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर कांग्रेस की मजबूत संगठनात्मक पकड़ और कार्यकर्ताओं की प्रतिबद्धता का प्रमाण है। दूसरी ओर, सत्ता के भरोसे राजनीतिक बढ़त हासिल करने की उम्मीद रखने वालों को यह परिणाम स्पष्ट संदेश देता है कि लोकतंत्र में अंतिम निर्णय जनता का होता है, किसी पद, प्रभाव या तथाकथित “डबल इंजन” का नहीं।

पलारी की राजनीति ने एक बार फिर साबित कर दिया कि जब संगठन मजबूत हो, नेतृत्व पर भरोसा हो और जनप्रतिनिधि एकजुट रहें, तब किसी भी प्रकार का दबाव या राजनीतिक दांवपेच जनता के फैसले को बदल नहीं सकता। कांग्रेस की यह सफलता उसी एकता और विश्वास की कहानी बयां करती है।

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