अब इंसान नहीं, इंजन लड़ेगा चुनाव! पीएम मोदी की “पक्की गारंटी” पर बड़ा सवाल
आज राजनीतिक मंचों से लेकर चुनावी सभाओं तक “डबल इंजन सरकार”, “ट्रिपल इंजन सरकार” जैसे शब्द लगातार सुनाई देते हैं।

संपादक:- मीनू साहू
बालोद:- देश की आजादी के बाद बनाए गए संविधान अनुसार प्रजातंत्र अपने मूलभूत सुविधाओं की पूर्ति, सही तरीके से सभी के विकास आदि के लिए अपने बीच के समझदार, जानकार व्यक्तियों का मतदान कर नेता, सियान बनाते है। लोकतंत्र की पूरी व्यवस्था इसी सोच पर आधारित है कि जनता अपने प्रतिनिधि चुने और वे जनता की समस्याओं, आवश्यकताओं तथा अधिकारों की रक्षा करें। लेकिन समय के साथ राजनीति की भाषा और स्वरूप में ऐसे बदलाव देखने को मिल रहे हैं, जिन पर गंभीर चर्चा होना आवश्यक हो गया है।
लेकिन अब देश के प्रधानमंत्री मोदी जो अपने जीवनकाल के लगभग 75 सालों में देश में कुछ नहीं देखने का दावा करते हुए देश में 12 सालों तक पीएम बनकर कई प्रकार से बदलाव करते हुए अब संविधान में बदलाव करते हुए इंसानों के जगह मशीन, इंजन का सरकार बना रहा है। तभी तो देश, प्रदेश के भाजपा सरकार के मंत्रिमंडल, भाजपा पार्टी समर्थित लोग आमसभा आदि में सिंगल, डबल, ट्रिपल इंजन का सरकार कहते है।
आज राजनीतिक मंचों से लेकर चुनावी सभाओं तक “डबल इंजन सरकार”, “ट्रिपल इंजन सरकार” जैसे शब्द लगातार सुनाई देते हैं। सवाल यह उठता है कि आखिर लोकतंत्र में जनता व्यक्ति को चुनती है या इंजन को? संविधान ने मतदाता को प्रतिनिधि चुनने का अधिकार दिया है, मशीन या इंजन चुनने का नहीं। लोकतंत्र में सांसद, विधायक, पार्षद, सरपंच और जनप्रतिनिधि जनता की आवाज होते हैं, लेकिन राजनीतिक प्रचार में अब व्यक्ति और उसकी जवाबदेही पीछे छूटती नजर आ रही है तथा “इंजन” की अवधारणा आगे बढ़ाई जा रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लोकतंत्र की असली ताकत जनता और उसके द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों में होती है। विकास, सुशासन और जवाबदेही का मूल्यांकन भी जनप्रतिनिधियों के कार्यों के आधार पर होना चाहिए, न कि केवल चुनावी नारों के आधार पर। ऐसे में “सिंगल, डबल और ट्रिपल इंजन” जैसे शब्दों का बढ़ता उपयोग राजनीतिक बहस का नया विषय बन चुका है।
लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि यहां अंतिम फैसला जनता करती है। जनता यह तय करती है कि उसके बीच से कौन नेतृत्व करेगा, कौन उसकी समस्याओं को उठाएगा और कौन उसके विश्वास पर खरा उतरेगा। इसलिए आज यह बहस तेज हो रही है कि आने वाले समय में चुनाव इंसान लड़ेंगे या फिर राजनीतिक विमर्श पूरी तरह “इंजन” के इर्द-गिर्द घूमता नजर आएगा।जनता के बीच यही चर्चा है कि लोकतंत्र की असली पहचान जनप्रतिनिधि हैं, इंजन नहीं। अब देखना यह है कि भविष्य की राजनीति जनता के भरोसे चलेगी या फिर “इंजन मॉडल” ही चुनावी मैदान का सबसे बड़ा चेहरा बन जाएगा।



