हमर छत्तीसगढ़

खबर छपी तो मचा हड़कंप! 10 दिन बाद कलंकपुर पहुंचा कृषि विभाग

संपादक:- मीनू साहू 

दवा मामले में कार्रवाई की टाइमिंग पर सवाल, प्रेस वार्ता से लेकर जांच और क्लीन चिट तक पूरा घटनाक्रम बना चर्चा का विषय—किसानों को अब रिपोर्ट का इंतजार

बालोद/गुंडरदेही :- छत्तीसगढ़ के बालोद जिला में गुंडरदेही ब्लॉक के ग्राम पंचायत कलंकपुर में कृषि दवाइयों को लेकर उठे सवाल अब सिर्फ कथित अनियमितता तक सीमित नहीं हैं। मामला सामने आने के बाद विभागीय कार्रवाई की टाइमिंग, जांच की प्रक्रिया और उसके निष्कर्ष ने कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि खबर सामने आने के करीब 10 दिन बाद जिला कृषि विभाग जांच के लिए कलंकपुर पहुंचा। इसके बाद संबंधित दवा कंपनियों की मौजूदगी में जांच और क्लीन चिट की बात सामने आई।यहीं से सवाल और गहरा जाता है—यदि सब कुछ नियमानुसार था तो जांच में इतनी देरी क्यों हुई? और यदि शिकायत या संदेह गंभीर था तो खबर प्रकाशित होने से पहले विभाग मौके पर क्यों नहीं पहुंचा?मामले का घटनाक्रम भी कम दिलचस्प नहीं है। जिस दिन प्रकरण से संबंधित खबर सामने आई, उसी दिन कलंकपुर के एक दुकानदार द्धारा जिला कृषि विभाग कार्यालय पहुंचने की चर्चा चौक चौराहों गांव गली मोहल्ला से होते हुए शहर तक हो रही हैं जबकि खबर में उनका नाम या दुकान का नाम ही नहीं था। अब 10 दिन बाद विभागीय जांच और क्लीन चिट ने पूरे घटनाक्रम की टाइमिंग को लेकर चर्चा और तेज कर दी है।इसके बाद प्रेस वार्ता कर सफाई दी गई।

क्लीन चिट पर सवाल नहीं, उसकी सक्रियता और संरचना पर गंभीर सवाल?

किसी भी कारोबारी या दवा विक्रेता को बिना प्रमाण दोषी ठहराना उचित नहीं है। लेकिन दूसरी तरफ केवल जांच के बाद क्लीन चिट मिल जाना भी अंतिम जवाब नहीं माना जा सकता, जब तक जांच की पूरी प्रक्रिया सार्वजनिक न हो।जिन उत्पादों को लेकर सवाल उठे, उनके नमूने लिए गए या नहीं? किस अधिकृत प्रयोगशाला में परीक्षण हुआ? रिपोर्ट कब आई? स्टॉक, बिल, बैच नंबर, लाइसेंस और खरीद संबंधी दस्तावेजों की जांच हुई या नहीं? इन सवालों के जवाब सामने आना जरूरी है।सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि यदि संबंधित दवा कंपनियों के प्रतिनिधि जांच में शामिल थे, तो परीक्षण की स्वतंत्रता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए क्या व्यवस्था अपनाई गई? यही वह बिंदु है, जहां क्लीन चिट के बावजूद संदेह पूरी तरह समाप्त नहीं हो पा रहा है।

कलंकपुर और 20 साल पुरानी खाद की कहानी

कलंकपुर क्षेत्र का नाम कृषि सामग्री से जुड़े विवाद में पहली बार चर्चा में नहीं आया। स्थानीय स्तर पर करीब दो दशक पुराने नकली खाद प्रकरण की चर्चा भी फिर सामने आई है। गुंडरदेही के एक वरिष्ठ नेता ने पुराने मामले का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे प्रकरण पहले भी सामने आते रहे हैं।अब सवाल यह है कि क्या कृषि विभाग के रिकॉर्ड में उस पुराने प्रकरण का उल्लेख मौजूद है? उस समय क्या कार्रवाई हुई थी? क्या बाद में निगरानी व्यवस्था बदली गई? यदि बदलाव हुए तो आज फिर कृषि उत्पादों की गुणवत्ता पर सवाल कैसे उठ रहे हैं? क्योंकि यह मामला अन्नदाता से जुड़ा होने के कारण लोक सभा और विधान सभा में प्रश्न उठना लाजिमी है।

बीच में पिसता है किसान

खाद हो, बीज हो या कृषि दवा—किसान के लिए यह केवल बाजार की वस्तु नहीं, बल्कि उसकी पूरी फसल की उम्मीद होती है। गुणवत्ता पर संदेह पैदा होने की स्थिति में सबसे बड़ा जोखिम किसान उठाता है। यदि खराब या मानकविहीन सामग्री का इस्तेमाल होता है तो उत्पादन प्रभावित होने की आशंका रहती है और आर्थिक नुकसान की भरपाई आसान नहीं होती।इसलिए विभागीय कार्रवाई केवल कागजी खानापूर्ति तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। किसानों को यह भरोसा चाहिए कि शिकायत पर तत्काल  निष्कर्ष प्रमाण के साथ सामने आएगा।

अब जिला प्रशासन को जवाब देना होगा

कलंकपुर प्रकरण में जिला कृषि विभाग और प्रशासन के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि 10 दिन की देरी क्यों हुई और क्लीन चिट किस ठोस जांच के आधार पर दी गई? प्रेस वार्ता से सवाल शांत हो सकते हैं, लेकिन किसानों का भरोसा केवल पारदर्शी जांच और दस्तावेजी सच से ही लौटेगा। कलंकपुर में अब निगाहें इसी बात पर हैं कि विभाग की जांच वास्तव में सच सामने लाई है या फिर मामला सिर्फ सफाई और क्लीन चिट तक सीमित होकर रह जाएगा।

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