आबादी के करीब भालू की मौजूदगी से दहशत, जनप्रतिनिधियों ने एकजुट होकर सौंपा ज्ञापन
कार्रवाई के बजाय आश्वासन तक सिमटी व्यवस्था, प्रशासनिक उत्तरदायित्व पर भी उठे सवाल

संपादक मीनू साहू
24 घंटे का दावा, 8 दिन का इंतजार मरदेल में भालू के खौफ से सहमे ग्रामीण, वन विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल
बालोद/डौंडी:- बालोद जिला के डौंडी वन परिक्षेत्र में रहवासी इलाका के ग्राम मरदेल क्षेत्र में ग्रामीणों का आरोप है कि आबादी के नजदीक भालू छोड़े जाने के बाद स्थिति को गंभीरता से संभालने के बजाय विभागीय स्तर पर तत्काल समाधान का आश्वासन दिया गया। लेकिन समय बीतता गया और समस्या समाप्त नहीं हुई। इससे ग्रामीणों का भरोसा कमजोर होने के साथ सुरक्षा व्यवस्था को लेकर बेचैनी और बढ़ गई है।भालू की मौजूदगी अब केवल वन्यजीव प्रबंधन का मामला नहीं रह गया है। आबादी के आसपास भालू घूमने की सूचना से ग्रामीणों में दहशत और असुरक्षा की स्थिति बनी हुई है। सबसे गंभीर बात यह है कि वन विभाग की ओर से 24 घंटे में भालू को पकड़ने का भरोसा दिए जाने के बावजूद आठ दिन बाद भी ग्रामीणों को अपेक्षित राहत नहीं मिल पाई है। इससे विभागीय कार्यप्रणाली और प्रशासनिक निगरानी दोनों सवालों के घेरे में आ गए हैं।
डर के साये में गुजर रहे ग्रामीणों के दिन
मरदेल और आसपास के इलाकों में भालू की मौजूदगी की खबर ने ग्रामीणों की चिंता बढ़ा दी है। खेत, जंगल और आसपास के रास्तों से गुजरने वाले लोगों के बीच भय का वातावरण बनने की बात सामने आ रही है। ग्रामीणों के लिए यह महज वन्यजीव दिखाई देने की घटना नहीं, बल्कि अपने रोजमर्रा के आवागमन और सुरक्षा से जुड़ा विषय बन चुका है।।ग्रामीणों का आरोप है कि आबादी के नजदीक भालू छोड़े जाने के बाद स्थिति को गंभीरता से संभालने के बजाय विभागीय स्तर पर तत्काल समाधान का आश्वासन दिया गया। लेकिन समय बीतता गया और समस्या समाप्त नहीं हुई। इससे ग्रामीणों का भरोसा कमजोर होने के साथ सुरक्षा व्यवस्था को लेकर बेचैनी और बढ़ गई है।
पांच पंचायतो के जनप्रतिनिधि एक मंच पर
मामले को लेकर पांच पंचायतों के सरपंचों और जनप्रतिनिधियों ने अब सामूहिक रूप से आवाज उठाई है। वन मंत्री के नाम तहसीलदार को चार पेज का ज्ञापन सौंपते हुए डौंडी वन परिक्षेत्र के रेंजर जीवन भोंडेकर को हटाने, उनके कार्यकाल में हुए कार्यों की जांच कराने तथा पूर्व में लगाए गए आरोपों की जांच कर आवश्यक कार्रवाई की मांग की गई है।ज्ञापन सौंपने वालों में जनपद उपाध्यक्ष भोलाराम नेताम, जनपद सदस्य तुलेश्वर हिचामी, जनपद सदस्य साधना शोरी, महावीर ठाकुर, भाजपा महामंत्री हिंसाराम साहू सहित विभिन्न पंचायतों के सरपंच और जनप्रतिनिधि शामिल रहे।जनप्रतिनिधियों ने चेतावनी दी है कि मांगों पर कार्रवाई नहीं हुई तो तहसील कार्यालय के सामने धरना-प्रदर्शन और इसके बाद चक्काजाम किया जाएगा।
वन विभाग की लापरवाही पर सवाल
14 सितंबर को रानीमाई मंदिर क्षेत्र से पकड़े गए भालू को मरदेल के नजदीक छोड़े जाने की जानकारी के बाद विवाद शुरू हुआ। ग्रामीणों ने अधिकारियों और कर्मचारियों का घेराव किया। स्थिति बिगड़ने पर बालोद से एसडीओ को मौके पर पहुंचना पड़ा।इसके बाद 24 घंटे में भालू पकड़ने का आश्वासन दिया गया। लेकिन आठ दिन गुजरने के बाद भी वही स्थिति बनी रहना विभाग की तैयारियों और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। यदि विभाग के पास अभियान चलाने की क्षमता थी, तो परिणाम सामने क्यों नहीं आया? और यदि परिस्थितियां कठिन थीं, तो ग्रामीणों को वास्तविक स्थिति से अवगत क्यों नहीं कराया गया?
प्रशासन की भूमिका भी कठघरे में
मामले में प्रशासन की जिम्मेदारी भी नजरअंदाज नहीं की जा सकती। ग्रामीण सुरक्षा से जुड़े विषय में केवल मौके पर पहुंचकर स्थिति शांत कर देना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। आश्वासन के बाद उसकी प्रगति की निगरानी, संबंधित विभाग से रिपोर्ट लेना और समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित करना प्रशासनिक उत्तरदायित्व का हिस्सा है।अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि 24 घंटे का भरोसा आठ दिन में भी परिणाम में क्यों नहीं बदल सका? ग्रामीणों की दहशत, जनप्रतिनिधियों का विरोध और आंदोलन की चेतावनी सामने आने के बावजूद यदि ठोस कार्रवाई में देरी रहती है, तो जवाबदेही आखिर किसकी तय होगी?मरदेल में अब सवाल सिर्फ भालू का नहीं, बल्कि व्यवस्था की संवेदनशीलता, विभागीय तत्परता और प्रशासनिक उत्तरदायित्व का है।



