रूपहीहाट में संगठनात्मक दायित्व निभाने पहुंचे बालोद के कांग्रेस कार्यकर्ता ने कहा कि पथराव और हिंसा जैसी वारदात लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन है
असम से बालोद तक सियासत का संदेश, कांग्रेसियों ने लोकतांत्रिक माहौल पर उठाए सवाल

संपादक:- मीनू साहू
बालोद :- देश के बेहतरीन राज्यों में से एक असम राज्य के रूपहीहाट विधानसभा क्षेत्र में संगठनात्मक दायित्व के तहत सक्रिय बालोद जिले के कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं ने वहां की राजनीतिक परिस्थितियों को राष्ट्रीय लोकतांत्रिक मुद्दों से अपनी गतिविधियां तेज की हैं। पूर्व में रहे छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल द्वारा सौंपे गए दायित्व के तहत क्षेत्र में जनसंपर्क, बैठकें और कांग्रेस पदाधिकारियों के साथ संवाद करने पहुंचे लोगों के साथ हिंसा जैसी घटना होने की बात सामने आई है।
*बालोद के वरिष्ठ राजनीतिक कार्यकर्ता प्रकाश नाहटा ने व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा*
“लोकतंत्र का सबसे बड़ा सौंदर्य यही है कि यहां असहमति के लिए माइक होना चाहिए, मुक्का नहीं; सवाल का जवाब तर्क से होना चाहिए, धमकी से नहीं। अगर राजनीतिक पंडाल का मुकाबला आग से और विचारों का जवाब डर से दिया जाने लगे तो फिर चुनावी राजनीति नहीं, लोकतांत्रिक संस्कारों की परीक्षा शुरू हो जाती है। कुर्सियां बदलती रहती हैं, सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन संविधान की मर्यादा स्थायी रहनी चाहिए।”
बालोद से असम तक पहुंचे कांग्रेस कार्यकर्ताओं का कहना है कि राजनीतिक संगठन की जिम्मेदारी केवल बैठकों तक सीमित नहीं होती, बल्कि स्थानीय परिस्थितियों को समझना और कार्यकर्ताओं के साथ लगातार संवाद बनाए रखना भी उसका महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसी क्रम में रूपहीहाट क्षेत्र में संगठनात्मक गतिविधियों को गति देने पर जोर दिया गया।
इसी दौरान कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं पर कथित हमले, कार्यक्रम स्थलों में आगजनी तथा डराने-धमकाने के आरोपों ने राजनीतिक वातावरण को लेकर सवाल खड़े किए हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि प्रत्येक मामले में आवश्यक है, लेकिन कांग्रेस कार्यकर्ताओं का कहना है कि किसी भी राजनीतिक दल के कार्यक्रम को भय या दबाव के वातावरण में संचालित करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए गंभीर विषय है।
बालोद के उच्च श्रेष्ठ कांग्रेसी नेताओं की दृष्टिकोण से यह मुद्दा केवल असम तक सीमित नहीं है। उनका तर्क है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में राजनीतिक मतभेदों के बावजूद विरोध और समर्थन की अभिव्यक्ति संवैधानिक दायरे में होनी चाहिए। उनका कहना है कि लोकतंत्र में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक है, लेकिन हिंसा, धमकी अथवा सार्वजनिक कार्यक्रमों में व्यवधान की शिकायतों को गंभीरता से देखा जाना चाहिए।
राष्ट्रीय स्तर पर भी राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप लगातार सामने आते रहे हैं। कांग्रेस की ओर से कई मौकों पर राजनीतिक हिंसा और कार्यकर्ताओं की सुरक्षा को लेकर सवाल उठाए गए हैं, जबकि प्रतिद्वंद्वी दल इन आरोपों को राजनीतिक दृष्टिकोण से देखते रहे हैं। ऐसे मामलों में वास्तविक स्थिति निर्धारित करने के लिए प्रशासनिक जांच और उपलब्ध साक्ष्यों का महत्व बना रहता है।
कांग्रेसियों का कहना है कि असम में निभाया जा रहा संगठनात्मक दायित्व उनके लिए स्थानीय राजनीतिक अनुभव को राष्ट्रीय लोकतांत्रिक विमर्श से जोड़ने का अवसर भी है। उनके अनुसार राजनीतिक गतिविधियों में पारदर्शिता, शांतिपूर्ण संवाद, कार्यकर्ताओं की सुरक्षा और नागरिकों की स्वतंत्र राजनीतिक अभिव्यक्ति जैसे विषय किसी एक प्रदेश या दल तक सीमित नहीं हैं।
रूपहीहाट का घटनाक्रम इसी व्यापक प्रश्न को सामने रखता है कि राजनीतिक संघर्ष चाहे कितना भी तीखा क्यों न हो, लोकतांत्रिक संस्थाओं और संवैधानिक अधिकारों की सीमा के भीतर ही रहना चाहिए।



