चार वोट की जीत और RTI के दस्तावेज गुंडरदेही में मतदाता सूची पर गंभीर सवाल, राहुल गांधी के राष्ट्रीय ‘वोट चोरी’ बहस तक पहुंचा मामला
वार्ड 14 की शिकायत में दोहरे नाम, अलग-अलग पते और कथित दस्तावेजी गड़बड़ी के दावे अब निर्वाचन प्रक्रिया में सत्यापन और जिम्मेदारी तय करने की मांग

संपादक:- मीनू साहू
बालोद/गुंडरदेही (AD न्यूज):- गुंडरदेही नगर पंचायत चुनाव 2025 के वार्ड क्रमांक 14 में महज चार वोट के अंतर से सामने आए चुनाव परिणाम के बाद मतदाता सूची को लेकर उठे सवाल अब दस्तावेजी जांच की मांग तक पहुंच गए हैं। शिकायतकर्ता ललिमा टंडन का दावा है कि कई विवादित प्रविष्टियों से संबंधित रिकॉर्ड सूचना के अधिकार अधिनियम के माध्यम से सरकारी कार्यालयों से प्राप्त किए गए हैं। शिकायत में दोहरे नाम, अलग-अलग स्थानों पर निवास और कथित गलत दस्तावेजों के आधार पर मतदाता प्रविष्टियां किए जाने के आरोप लगाए गए हैं। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि जांच के बिना नहीं मानी जा सकती।
राहुल गांधी की ‘वोट चोरी’ बहस से स्थानीय मामला कैसे जुड़ता है?
देश में मतदाता सूची को लेकर चल रही बहस के बीच राहुल गांधी ने 24 सितंबर 2026 को ‘वोट चोरी’, ‘कानून चोरी’ और ‘संस्था चोरी’ जैसे आरोप लगाते हुए निर्वाचन प्रक्रिया पर सवाल उठाए। निर्वाचन आयोग ने इन आरोपों को स्वीकार नहीं किया है। 29 सितंबर को भी राहुल गांधी ने मतदाता सूचियों में कथित हेरफेर का मुद्दा उठाया।मामले का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि वार्ड में जीत का अंतर केवल चार वोट बताया गया है। ऐसे में यदि किसी मतदाता की पात्रता, नामांकन, विलोपन या मतदान संबंधी रिकॉर्ड में गंभीर विसंगति सामने आती है तो उसका चुनाव परिणाम पर वास्तविक प्रभाव अलग से जांच का विषय बनेगा।
एक ही व्यक्ति के नाम अलग-अलग स्थानों पर होने का दावा
शिकायत के अनुसार मंशीर राम टंडन, बिसाहिन बाई टंडन और मनोज कुमार टंडन के नाम लोकसभा चुनाव 2024 की मतदाता सूची में दर्ज थे, लेकिन नगर पंचायत चुनाव की सूची में उनके नाम हटाए जाने का कारण एक ही घर से संबंधित होना बताया गया। इसके विपरीत सोमलाल सिन्हा और उर्मिला सिन्हा के नाम ग्राम सिब्दी तथा गुंडरदेही के चैनगंज वार्ड में दर्ज होने का दावा किया गया है। शिकायतकर्ता ने दोनों स्थानों पर मतदान किए जाने की बात भी कही है।इन आरोपों के समर्थन में राशन कार्ड, मनरेगा रिकॉर्ड, ग्राम पंचायत से संबंधित दस्तावेज और निवास संबंधी प्रमाण प्रस्तुत किए जाने की बात कही गई है। अब जांच का प्रमुख बिंदु यह होगा कि संबंधित दस्तावेज वास्तव में किस व्यक्ति के निवास को प्रमाणित करते हैं और मतदाता सूची तैयार करते समय उनका सत्यापन किस स्तर पर हुआ।
कई नाम और एक ही पते को लेकर सवाल
शिकायत में चंद्रिका बाई जांगड़े और खुमान सिंह जांगड़े के नाम देमार से जुड़े होने के बावजूद गुंडरदेही की सूची में दर्ज होने का दावा है। इसी तरह अमर बाई महिपाल, सरस्वती महिपाल, भारत महिपाल और मोनिका महिपाल के संबंध में शिवपारा स्टेशन मरोदा का निवासी होने के बावजूद चैनगंज में नाम दर्ज होने की बात कही गई है।रेखा खुटेल, येनुका खुटेल और रश्मि खुटेल के नामों को लेकर भी भिलाई उमरपोटी में निवास होने के बावजूद गुंडरदेही की सूची में प्रविष्टि का आरोप है। शिकायतकर्ता का दावा है कि कुछ मामलों में दूसरे व्यक्तियों के दस्तावेज अथवा आधार संबंधी कागजात इस्तेमाल किए गए तथा कई प्रविष्टियों में मकान नंबर 94 का उल्लेख मिलता है।इन आरोपों में सेवक महिपाल से जुड़े पते और संबंधित व्यक्तियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं। हालांकि किसी व्यक्ति की संलिप्तता केवल शिकायत के आधार पर स्थापित नहीं मानी जा सकती। इसके लिए मूल आवेदन, संलग्न दस्तावेज, BLO की रिपोर्ट, सत्यापन प्रक्रिया और अंतिम सूची तैयार करने वाली फाइल का परीक्षण आवश्यक होगा।गुंडरदेही का मामला हालांकि राष्ट्रीय राजनीतिक आरोपों से स्वतः प्रमाणित नहीं हो जाता। यहां निर्णायक महत्व RTI से प्राप्त रिकॉर्ड और मूल निर्वाचन दस्तावेजों के स्वतंत्र मिलान का है। यदि किसी व्यक्ति का नाम नियमों के विपरीत दो स्थानों पर दर्ज मिला, किसी पात्र मतदाता का नाम अनुचित तरीके से हटाया गया या गलत दस्तावेज से प्रविष्टि कराई गई, तो उसकी प्रकृति और जिम्मेदारी अलग-अलग निर्धारित करनी होगी।
कानून में भी है जवाबदेही का प्रावधान
लोकप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 31 मतदाता सूची से संबंधित जानबूझकर की गई गलत घोषणा पर दंड का प्रावधान करती है, जबकि धारा 32 निर्वाचन नामावली तैयार करने से जुड़े आधिकारिक कर्तव्य के उल्लंघन से संबंधित है।दूसरे व्यक्ति के नाम पर मतदान अथवा एक चुनाव में एक से अधिक बार मतदान किए जाने के आरोपों की स्थिति में लागू चुनावी और दंड कानूनों के तहत अलग जांच की आवश्यकता होगी। यदि दस्तावेजों की जालसाजी प्रमाणित होती है तो उसके लिए भी संबंधित आपराधिक प्रावधानों की जांच की जा सकती है। इसलिए केवल मतदाता सूची में सुधार पर्याप्त होगा या आपराधिक कार्रवाई भी बनेगी, यह जांच के निष्कर्ष पर निर्भर करेगा।
अब असली सवाल गलती हुई, लापरवाही या जानबूझकर प्रक्रिया का उल्लंघन?
जांच में यह स्पष्ट होना चाहिए कि विवादित नामों के लिए आवेदन किसने दिया, कौन-से प्रमाण लगाए गए, BLO ने क्या सत्यापन किया, आपत्तियां आईं या नहीं, अंतिम निर्णय किस अधिकारी ने लिया और सूची में नाम शामिल अथवा हटाने का आधार क्या दर्ज किया गया।चार वोट के अंतर वाले चुनाव में इन सवालों को केवल राजनीतिक विवाद कहकर समाप्त करना पर्याप्त नहीं होगा। यदि दस्तावेज आरोपों की पुष्टि करते हैं तो संबंधित व्यक्ति और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका कानून के अनुसार तय होनी चाहिए। यदि रिकॉर्ड आरोपों की पुष्टि नहीं करते तो शिकायत की वास्तविक स्थिति भी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट होनी चाहिए।
गुंडरदेही का मूल सवाल यही है—क्या मतदाता सूची की कथित गड़बड़ियों का चुनाव परिणाम पर कोई वास्तविक प्रभाव पड़ा? इसका उत्तर राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि मूल निर्वाचन रिकॉर्ड, RTI दस्तावेज और स्वतंत्र जांच का मिलान देगा।



