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प्रकाश नाहटा का बड़ा बयान शंकर गुहा नियोगी की विचारधारा आज भी श्रमिक न्याय की मशाल

दल्लीराजहरा की खदानों से उठी मजदूर क्रांति ने बदली संघर्ष की परिभाषा, शहादत के 35 वर्ष बाद भी देश की श्रमिक चेतना में जीवित हैं नियोगी

संपादक:- मीनू साहू 

बालोद/दल्लीराजहरा :- छत्तीसगढ़ के बालोद जिले की दल्लीराजहरा की धरती से निकली शहीद शंकर गुहा नियोगी की संघर्षगाथा भारतीय श्रमिक आंदोलन के इतिहास का ऐसा अध्याय है, जिसने मजदूरों के अधिकार, सम्मान और सामाजिक न्याय के सवालों को राष्ट्रीय पहचान दिलाई। गुंडरदेही के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता प्रकाश नाहटा ने नियोगी की विचारधारा को श्रमिकों के अधिकारों और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष की सतत प्रेरणा बताते हुए उनकी विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

प्रकाश नाहटा का संदेश नियोगी का संघर्ष आज भी प्रासंगिक

वरिष्ठ कांग्रेसी नेता प्रकाश नाहटा ने प्रकाशन हेतु प्रस्तावित वक्तव्य में कहा कि शहीद शंकर गुहा नियोगी का जीवन केवल मजदूर आंदोलन तक सीमित नहीं था, बल्कि वह समाज के वंचित और मेहनतकश वर्ग को सम्मानजनक जीवन दिलाने की व्यापक सोच का प्रतीक था।प्रकाश नाहटा के अनुसार, शंकर गुहा नियोगी एक व्यक्ति नहीं, संघर्ष की वह धारा हैं, जो अन्याय के विरुद्ध उठने वाली हर आवाज में आज भी जीवित है।उन्होंने कहा कि दल्लीराजहरा की खदानों से शुरू हुई श्रमिक चेतना ने पूरे देश को यह संदेश दिया कि विकास का वास्तविक अर्थ तभी सार्थक है, जब मजदूरों को उचित पारिश्रमिक, सुरक्षित कार्यस्थल, स्वास्थ्य सुविधाएं और सामाजिक सम्मान मिले।

 दल्लीराजहरा से राष्ट्रीय पहचान तक का सफर

14 फरवरी 1943 को जन्मे शंकर गुहा नियोगी ने दल्लीराजहरा के लौह अयस्क खदान क्षेत्र में मजदूरों की कठिनाइयों को करीब से समझा। ठेका श्रमिकों की समस्याएं, असुरक्षित कार्य परिस्थितियां और रोजगार की अनिश्चितता उनके संघर्ष के प्रमुख विषय बने।वर्ष 1977 में छत्तीसगढ़ माइंस श्रमिक संघ के नेतृत्व में मजदूरों की एकजुटता ने वेतन, रोजगार सुरक्षा और सम्मानजनक कार्य परिस्थितियों के मुद्दों को व्यापक आंदोलन का स्वरूप दिया। इस संघर्ष ने दल्लीराजहरा को राष्ट्रीय श्रमिक चेतना के मानचित्र पर विशेष पहचान दिलाई।

 संघर्ष के साथ निर्माण बना आंदोलन की पहचान

नियोगी की विचारधारा की विशेषता आंदोलन के साथ सामाजिक निर्माण को जोड़ना था। दल्लीराजहरा में शहीद अस्पताल की स्थापना ने मजदूरों और उनके परिवारों के लिए चिकित्सा सुविधाओं की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की।छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के माध्यम से उन्होंने मजदूरों, किसानों और ग्रामीण श्रमिकों को जोड़ने का प्रयास किया। महिला मुक्ति मोर्चा तथा सामाजिक जागरूकता अभियानों ने महिलाओं की भागीदारी और श्रमिक परिवारों के सवालों को भी व्यापक पहचान दिलाई।

28 सितंबर 1991 की शहादत, संघर्ष की अमर विरासत

28 सितंबर 1991 को भिलाई में शंकर गुहा नियोगी की हत्या कर दी गई। उनकी शहादत ने देशभर में श्रमिक नेताओं की सुरक्षा और औद्योगिक संबंधों पर गंभीर सवाल खड़े किए।प्रकाश नाहटा ने नियोगी की विरासत को आगे बढ़ाने का संदेश देते हुए कहा कि मजदूरों को न्याय, सम्मान और सुरक्षित भविष्य दिलाने के प्रयास ही उनके संघर्षों के प्रति सच्ची प्रतिबद्धता हैं।दल्लीराजहरा की धरती से उठी यह आवाज आज भी श्रमिक अधिकारों, सामाजिक समानता और मानवीय विकास की चर्चा में अपनी ऐतिहासिक उपस्थिति दर्ज कराती है।

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