हमर छत्तीसगढ़

बिजली बिल तक नहीं भर पाया गुंडरदेही तहसील कार्यालय!

कलेक्टर की निगरानी भी कठघरे में विभाग की ‘व्यवस्था’ पर बड़ा सवाल

संपादक:- मीनू साहू 

बालोद:- बालोद जिले के गुंडरदेही तहसील कार्यालय से सरकारी व्यवस्था की बदहाली का ऐसा मामला सामने आया है, जो पूरे राजस्व तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है। बताया जा रहा है कि तहसील परिसर का बिजली बिल जमा नहीं होने के कारण बिजली कनेक्शन काट दिया गया। जिस कार्यालय पर आम जनता के जमीन, नामांतरण, सीमांकन, बंटवारा और राजस्व संबंधी मामलों का समाधान करने की जिम्मेदारी है, उसी सरकारी दफ्तर में बिजली व्यवस्था तक कायम नहीं रखी जा सकी।

नए तहसीलदार की पदस्थापना के बाद से गुंडरदेही तहसील परिसर लगातार किसी न किसी वजह से चर्चा में बना हुआ है। अब बिजली कटने की घटना ने प्रशासनिक निगरानी और कार्यालयीन प्रबंधन दोनों की पोल खोल दी है। सवाल सीधा है—सरकारी कार्यालय का बिजली बिल समय पर जमा कराने की जिम्मेदारी आखिर किसकी थी? यदि इतनी सामान्य जिम्मेदारी भी निभाने में तंत्र नाकाम है, तो जनता अपने जरूरी राजस्व मामलों में कितनी संवेदनशील और जवाबदेह व्यवस्था की उम्मीद करे?

सबसे गंभीर बात यह है कि तहसील कार्यालय को लेकर आम लोगों में पहले से ही असंतोष की चर्चाएं सुनाई देती रही हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि राजस्व संबंधी कामकाज में बिना लेन-देन के काम आगे बढ़ाना मुश्किल होता है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है, लेकिन यदि जनता के बीच ऐसी धारणा लगातार बनी हुई है तो प्रशासन के लिए यह बेहद गंभीर चेतावनी होनी चाहिए।

राजस्व विभाग को जनता की सुविधा का केंद्र होना चाहिए, न कि ऐसी जगह जहां फरियादी अपने काम के लिए भटकते रहें। बिजली कटने की घटना ने व्यवस्था की उस कमजोरी को उजागर कर दिया है, जिसे सामान्य दिनों में फाइलों और सरकारी दावों के पीछे छिपा दिया जाता है।

यहां सवाल सिर्फ बिजली बिल का नहीं है। सवाल जवाबदेही, निगरानी और प्रशासनिक अनुशासन का है। यदि तहसील कार्यालय जैसी महत्वपूर्ण इकाई की बुनियादी जरूरतों पर भी जिम्मेदार अधिकारी नजर नहीं रख पा रहे हैं, तो जिला प्रशासन की मॉनिटरिंग व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

कलेक्टर को इस पूरे मामले को महज बिजली कटने की छोटी घटना मानकर नजरअंदाज करने के बजाय बिजली बिल बकाया रहने की वजह, भुगतान में देरी, जिम्मेदार अधिकारी और कार्यालय की वित्तीय व्यवस्था की जांच करानी चाहिए। साथ ही जनता द्वारा लगाए जा रहे रिश्वतखोरी के आरोपों की भी निष्पक्ष पड़ताल होनी चाहिए।

सरकारी तहसील अंधेरे में और जिम्मेदार मौन—यह व्यवस्था की मजबूती नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही का आईना है।

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