एंबुलेंस के डीजल पर बड़ा सवाल मरीजों की सेवा या ईंधन चोरी के खेल का अड्डा?

संपादक :- मीनू साहू
बालोद/रायपुर :- जिस एंबुलेंस का इंजन मरीजों की जिंदगी बचाने के लिए दौड़ना चाहिए, उसी के डीजल को लेकर उठे सवालों ने पूरी व्यवस्था की निगरानी पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। वाहन क्रमांक CG02AU1606 में ईंधन की कथित हेराफेरी और करीब 20 प्रतिशत डीजल कम मिलने के दावे ने जिम्मेदार तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामले को लेकर कर्तव्य न्याय भागीदारी आंदोलन भारत के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवशंकर सिंह ने जांच और दोषियों पर कार्रवाई की मांग की है।
शिकायत के अनुसार, 4 सितंबर 2026 को लगभग 11:20 बजे अंजनी फिलिंग स्टेशन से जुड़े घटनाक्रम में एंबुलेंस के चालक पर डीजल से भरा डिब्बा रखने का आरोप सामने आया। शिकायतकर्ता का दावा है कि चालक को कथित तौर पर डीजल डिब्बे में लेते हुए पकड़ा गया और इसके साथ अधिक राशि का बिल भी बनाया गया। तस्वीरों और वीडियो में एंबुलेंस के पास ईंधन के डिब्बे की मौजूदगी का दावा इस पूरे मामले को और गंभीर बना रहा है।
अब सवाल सिर्फ डीजल का नहीं, बल्कि सरकारी संसाधनों की निगरानी और जवाबदेही का है। यदि एंबुलेंस के लिए खरीदा गया ईंधन निर्धारित मात्रा में वाहन तक नहीं पहुंचा, तो बाकी ईंधन कहां गया? अगर बिल में एक मात्रा दर्ज है और वाहन की वास्तविक खपत उससे मेल नहीं खाती, तो इस अंतर की जिम्मेदारी किसकी है?
शिकायतकर्ता ने वाहन की लॉगबुक, जीपीएस लोकेशन, किलोमीटर रीडिंग, डीजल पर्ची, बिल, स्टॉक रजिस्टर और पेट्रोल पंप के बिक्री रिकॉर्ड की जांच कराने की मांग की है। साथ ही संबंधित समय की सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित कर वास्तविक स्थिति सामने लाने की बात कही गई है। इन दस्तावेजों का मिलान कई सवालों का जवाब दे सकता है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि एंबुलेंस कोई निजी सुविधा नहीं, बल्कि आपातकालीन सेवा का महत्वपूर्ण साधन है। इसके ईंधन में गड़बड़ी की आशंका केवल आर्थिक नुकसान तक सीमित नहीं रहती। यदि कम ईंधन के कारण किसी मरीज को ले जा रही गाड़ी रास्ते में रुकती है, तो इसका खामियाजा सीधे मरीज और उसके परिजनों को भुगतना पड़ सकता है।
शिवशंकर सिंह ने मांग की है कि मामले को महज कागजी शिकायत मानकर दबाया न जाए, बल्कि स्वतंत्र जांच कर पूरे ईंधन लेन-देन की परतें खोली जाएं। यदि जांच में चोरी अथवा वित्तीय अनियमितता प्रमाणित होती है, तो जिम्मेदार व्यक्ति चाहे किसी भी पद पर हो, उसके खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई की जाए।
फिलहाल आरोपों की पुष्टि जांच के बाद ही होगी, लेकिन 20 प्रतिशत कमी का दावा, ईंधन के डिब्बे और बिल को लेकर उठे सवाल व्यवस्था के सामने गंभीर चुनौती हैं। अब देखना यह है कि जांच वास्तव में सच सामने लाती है या फिर एंबुलेंस के डीजल का यह मामला भी फाइलों के ढेर में दबकर रह जाता है।



