चिखलाकसा-कुसुमकसा में जमीन कारोबार पर सवाल, कथित अवैध प्लाटिंग की जांच कब?
29 सितंबर की प्रस्तावित रजिस्ट्री को लेकर चर्चाएं तेज, कृषि भूमि के विभाजन, डायवर्सन और ले-आउट की वैधता स्पष्ट करने की मांग

संपादक:- मीनू साहू
बालोद/दल्ली राजहरा :- बालोद जिले के चिखलाकसा-कुसुमकसा क्षेत्र में कृषि भूमि को छोटे-छोटे भूखंडों में विभाजित कर बिक्री किए जाने की शिकायतों ने स्थानीय प्रशासन का ध्यान आकर्षित किया है। जमीन के कारोबार से जुड़े इस मामले में अब 29 सितंबर 2026 को प्रस्तावित बताई जा रही रजिस्ट्री को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि संबंधित कृषि भूमि को कथित तौर पर प्लॉट के स्वरूप में तैयार किया गया है। ऐसे में भूमि की वास्तविक स्थिति और आवश्यक अनुमतियों की जांच महत्वपूर्ण हो गई है।
रजिस्ट्री से पहले सामने आएं जमीन के दस्तावेज
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, संबंधित भूमि की रजिस्ट्री 29 सितंबर को प्रस्तावित बताई जा रही है। हालांकि, इसकी आधिकारिक पुष्टि और भूमि की वैधानिक स्थिति की जानकारी अभी सामने नहीं आई है। ऐसे में पंजीयन से पहले संबंधित दस्तावेजों का परीक्षण किए जाने की आवश्यकता है।सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि कृषि भूमि को आवासीय भूखंडों में विभाजित करने के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया गया है या नहीं। क्या भूमि का डायवर्सन कराया गया है? क्या सक्षम प्राधिकारी से प्लाटिंग की अनुमति प्राप्त है? क्या प्रस्तावित भूखंडों का स्वीकृत नक्शा और ले-आउट उपलब्ध है?इन बिंदुओं पर आधिकारिक जानकारी मिलने से ही स्पष्ट होगा कि संबंधित जमीन का विकास नियमों के अनुरूप किया गया है अथवा नहीं।
राजस्व अमले की भूमिका भी जांच के दायरे में
चिखलाकसा-कुसुमकसा क्षेत्र में भूमि संबंधी शिकायतों के बीच राजस्व विभाग की निगरानी व्यवस्था पर भी चर्चा हो रही है। कृषि भूमि के सीमांकन, अभिलेखों के संधारण और नामांतरण जैसी प्रक्रियाओं में संबंधित अधिकारियों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।ऐसे में पटवारी, राजस्व निरीक्षक और तहसील कार्यालय से यह अपेक्षा की जा रही है कि संबंधित भूमि के खसरा, नक्शा, स्वामित्व और विभाजन संबंधी अभिलेखों की जांच की जाए।यदि किसी जमीन का उपयोग निर्धारित नियमों के विपरीत पाया जाता है, तो नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। वहीं, वैध अनुमति होने की स्थिति में प्रशासन को दस्तावेजी आधार पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, ताकि खरीदारों और आम नागरिकों के बीच भ्रम की स्थिति न रहे।
आम खरीदारों की पूंजी पर जोखिम
जमीन की खरीद-बिक्री में सबसे अधिक जोखिम उन लोगों को उठाना पड़ सकता है, जो बिना पूरी जानकारी के भूखंड खरीद लेते हैं। अनधिकृत विकास की स्थिति में सड़क, नाली, बिजली, पानी और पहुंच मार्ग जैसी मूलभूत सुविधाओं की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।इसके अलावा स्वामित्व विवाद, निर्माण अनुमति और नामांतरण संबंधी अड़चनें भी सामने आ सकती हैं। इसलिए किसी भी भूखंड की खरीद से पहले भूमि रिकॉर्ड, डायवर्सन आदेश, स्वीकृत ले-आउट और संबंधित विभागों की अनुमतियों का सत्यापन आवश्यक है।
अब प्रशासन से स्पष्ट जवाब की अपेक्षा
29 सितंबर को प्रस्तावित बताई जा रही रजिस्ट्री के संदर्भ में संबंधित विभागों की जांच और आधिकारिक जानकारी का इंतजार है। प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि संबंधित भूमि का भू-उपयोग क्या है और प्लाटिंग के लिए आवश्यक वैधानिक औपचारिकताएं पूरी की गई हैं या नहीं।
जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
चिखलाकसा-कुसुमकसा में अब निगाहें राजस्व विभाग और पंजीयन अधिकारियों पर टिकी हैं। भूमि की वैधानिक स्थिति सार्वजनिक होने और निष्पक्ष जांच से ही वास्तविक तथ्य सामने आएंगे तथा संभावित खरीदारों के हितों की रक्षा हो सकेगी।सवाल बरकरार है—क्या प्रस्तावित रजिस्ट्री से पहले जांच होगी और कृषि भूमि की कथित अवैध प्लाटिंग पर प्रशासन अपना रुख स्पष्ट करेगा?



